Nibandh Essay

निबंध लिखने की कला | The Art of writing an Essay in Hindi

हिंदी, हिंदी निबंध

निबन्ध लिखना एक अत्यन्त लाभदायक एवं सृजनात्मक कला है। निबन्ध-लेखक न केवल अपने विचारों को संयत एवं संतुलित रूप देकर अपने व्यक्तित्व को गढ़ता है वरन् वह पाठकों को भी प्रेरणादायक सामग्री प्रस्तुत करता है । फलस्वरूप पाठक विचारों से प्रभावित होकर अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है । इंग्लैण्ड के निबन्ध लेखक बेकन के अनुसार” लिखना मनुष्य के विचारों को निर्दोष बनाता है और पढ़ना मनुष्य को प्रज्ञावान बनाता है ।”

निबन्ध विचारों की वह संगठित रचना है जिसे सरल, सुबोध एवं सरस भाषा शैली में लेखक पाठकों के सम्मुख  गद्य रूप में रखता है । क्रमबद्धता एवं रोचकता इसके प्राथमिक गुण माने जाते हैं । किसी विषय पर निबन्ध लिखने के लिये विशाल अनुभव, पर्याप्त चिन्तन एवं गहन अध्ययन की आवश्यकता होती है।

जितनी मात्रा में कोई लेखक इन्हें प्राप्त करता है उतनी ही मात्रा में उसके निबन्ध प्रभावकारी होते हैं अतःविद्यार्थियों का कर्तव्य है कि वे जीवन व प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण करने की आदत डालें और प्रत्येक समस्या पर चिन्तन और मनन करने का स्वभाव बनावें । फिर भी विचार ही सब कुछ नहीं है । विचारों की

अभिव्यक्ति अत्यन्त हृदयग्राही तभी बन पाती है जब इसके लिए सतत प्रयत्न किया जाय । अभ्यास इसी सतत् प्रयत्न का नाम है । अभ्यास से ही महामूर्ख महापंडित, हकलाने वाले महान वक्ता और साधारण लेखक महान लेखक बन जाते हैं । स्पष्ट है कि प्रत्येक विद्यार्थी में महान लेखक बनने की क्षमता विद्यमान है।

उसे प्रारम्भ में छोटे-छोटे विषयों पर लिखना प्रारम्भ करना चाहिये । कालान्तर में वह गहन विषयों पर सरलता से उच्चकोटि के निवन्ध लिखने लगेगा।

प्रमुख रूप से निवन्ध के दो अंग होते हैं । (1) विचार सामग्री, (2) भाषा-शैली । निबन्ध में विचार व भाषा का वही स्थान होता है जो मानव-शरीर में प्राण व श्वास का होता है । भाषा-शैली के सम्बन्ध में जितनी

सावधानी की आवश्यकता है उससे कहीं अधिक विचार-सामग्री पर ध्यान देना आवश्यक होता है।

विचार-सामग्री के विषय में निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिये।

1. विचार-सामग्री

समस्त निबन्ध विचार-प्रधान होता है लेकिन विचार के तीन पक्ष होते हैं । (1) प्रस्तावना के विचार,(2) मध्य भाग के विचार, (3) उपसंहार के विचार ।

(1) प्रस्तावना के विचार:- निबन्ध रूपी गृह के लिए प्रस्तावना या भूमिका या विषय-प्रवेश एक दरवाजे के समान है जिसके माध्यम से यह पता लग जाता है कि निवन्ध किस कोटि का होगा । पाठक के ध्यान को आकर्षित करने के लिये लेखक को अपनी समस्त चिन्तन एवं कल्पना शक्ति को जुटाना होता है ।अतः निबन्ध प्रारम्भ करते समय कोई ऐसी बात किसी ऐसी विधि से कहनी पड़ती है जो पाठक को आकर्षित कर ले । इसके लिए कुछ लेखक लेख से सम्बन्धित विषय के अनुसार किसी आदर्श वाक्य या कविता या किसी लोकोक्ति से लेख प्रारम्भ करते हैं । कुछ लेखक विषय-वस्तु में किसी गम्भीर कथन के साथ सीधे प्रवेश करते हैं । यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि विषय वस्तु का स्वरूप क्या है । उदाहरण के लिये

यदि किसी वीर राष्ट्र नायक पर निवन्ध लिखना है तो निम्नलिखित पंक्तियों से प्रारम्भ करना प्रेरणादायक एवं चित्ताकर्षक होगा।

“जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं

वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।”👌🏼

आशय यह है कि प्रस्तावना ऐसी हो जिससे पाठक का ध्यान इतना आकर्षित हो जाय कि वह समस्त निबन्ध को पढ़ जाने के लिए लालायित हो उठे । प्रस्तावना की रोचकता लेखक की क्षमता की कसौटी होती है और उसके प्रारम्भिक विचारों का प्रभाव अमिट हो जाता है । इसके अतिरिक्त प्रस्तावना के विचारों काआकार छोटा ही होना चाहिये । भाषा सरल किन्तु प्रवाहमयी एवं विषयानुकूल होनी चाहिये । शब्द-चयन उपयुक्त, अर्थपूर्ण एवं कलात्मक होना चाहिये । वाक्य यथा सम्भव बहुत बड़े नही होने चाहिये । ऐसी सुगठित प्रस्तावना प्रशंसा के योग्य होती है।

(2) मध्य भाग के विचार:- यह भाग निबन्ध का गूदा होता है | अतः जिस विषय को प्रतिपादित करना है उसके क्रमबद्ध संकेत निर्धारित कर लेना चाहिये । प्रत्येक वाक्य इस ढंग से आना चाहिये कि प्रथम वाक्य

का विचार दूसरे वाक्य के विचार से पूर्ण रूप से अलग न पड़ जाये । चूँकि विचार नदी के प्रवाह के समान होता है. अतः कमबद्धता उसका प्रथम गुण है । जब एक संकेत का विचार समार हो जाय तभी दूसरे संकेत

से सम्बन्धित विचार आने चाहिये । यदि एक सकेत का विचार एक अनुच्छेद के बराबर हो जाय तो दूसरे संकेत का विचार नवीन अनुच्छेद से प्रारम्भ करना चाहिये । अनुच्छेद (पैराग्राफ) बहुत बड़े-बड़े न होने चाहिये । पुनरुक्ति बचाना परमावश्यक है । निबन्ध का सबसे बड़ा गुण यह है कि लेखक संदिग्ध और

भ्रमात्मिक बातों को स्थान न दे पायः विद्यार्थी महान कवियो, लेखकों एवं विचारकों के कथन अपने निबन्ध मे देता है और यह उचित है लेकिन ऐसे आदर्श कथन अधिक संख्या में न होने चाहिये अन्यथा निवन्ध की मौलिकता नष्ट हो जायगी । निबन्ध लिखते समय यदि यह अनुभव हो कि समय थोड़ा है तो संकेतों के

अनुसार विचारों की व्याख्या छोटी कर देना चाहिये । ऐसी अवस्था में सारगर्भित वाक्य लिख कर मध्य भाग को समाप्त करना चाहिये । मध्य भाग के विचारों को यथा सम्भव विषयानुकूल होना चाहिये । जो बातें विषय

के अनुकूल नहीं हैं उन्हें कदापि स्थान न देना चाहिये ।

जहाँ तक संकेत बनाने का प्रश्न है विद्यार्थी को अपनी कल्पना शक्ति एवं अनुभव के आधार पर यह सोचना चाहिये कि विषय वस्तु क्या है. जीवन को इससे क्या लाभ है एवं यदि विषय वस्तु के प्रकार : तो क्या हो सकते है ? सारांश यह है कि कौन, क्या, कैसे, क्यों, कहाँ और कितना आदि प्रश्नों के उत्तर निवन्ध के मध्य भाग की रूप-रेखा तैयार कर देते हैं । उदाहरणार्थ- यदि ‘विद्यार्थी जीवन’ पर निबन्ध लिखना है तो निम्नलिखित संकेत उपयुक्त होगे- (क) विद्यार्थी कौन होता है ? (ख) विद्यार्थी के प्रमुख गुण क्या होने चाहिए ? (ग) विद्यार्थी जीवन किस प्रकार विकास की प्रथम सीढ़ी है?,(घ) विद्यार्थी जीवन की उपादयेता क्या है? लेकिन इस प्रकार के प्रश्न विद्यार्थी के मन में तभी उठ सकते हैं जब वह निरन्तर अच्छी पुस्तकों,विद्वानों के भाषणों, पत्रिकाओं, समाचार पत्रों एवं अध्यापकों के प्रवचनों के प्रति केन्द्रित मन से सावधान रहा हो और साथ ही जीवन के अनुभवों में आने वाले अनेकानेक तथ्यों को ध्यानपूर्वक समझा हो । प्रत्येक

विद्यार्थी को यह समझ लेना चाहिए कि बुद्धि नब्बे प्रतिशत मानसिक श्रम का ही नाम है और श्रम के साथ चित्त की एकाग्रता बहुत आवश्यक है।

(3) उपसंहार के विचार:- यह भाग अंतिम एवं बहुत महत्त्वपूर्ण होता है । प्रस्तावना की तरह इसे भी अत्यन्त प्रभावोत्पादक होना चाहिये । उपसंहार लेखक के विचारों का निचोड़ होता है । अतः इससे लेखक के आदर्शों एवं उसके समग्र व्यक्तित्व का पता लग जाता है। कभी-कभी प्रस्तावना और उपसंहार में आये

हुए वाक्यों के आधार पर ही विद्यार्थी को अच्छे अंक प्राप्त हो जाते हैं। अतः विद्यार्थी को उपसंहार लिखते समय अपने विचारों का निष्कर्ष सशक्त भाषा में देना चाहिये । इसके लिए प्रायः तीन विधियाँ अपनाई जा

सकती हैं- (1) या तो समस्त निबन्ध का सार किसी शिक्षाप्रद नैतिक वाक्य में लिखना चाहिये (2) या किसी कवि या लेखक की उक्ति देना चाहिए (3)या  निबन्ध का महत्त्व बताते हुए पाठकों को जीवन-संदेश देना चाहिए । उपसंहार अधिक से अधिक दो अनुच्छेदों से आगे न जाना चाहिये ।

2. भाषा शैली

भाषा विचारों का व्यक्त स्वरूप है या भाषा व्यक्त विचार है और विचार अव्यक्त भाषा है । इन दोनों में अटूट सम्बन्ध है । बिना भाषा के विचार व्यक्त नहीं हो सकते हैं । इतना ही नहीं, वरन् जिस प्रकार से साज श्रृंगार से युक्त स्त्री की शोभा होती है, उसी भाँति सुन्दर भाषा से ढके हुये विचार मनमोहक होते हैं।कोई लेखक

भाषा को जिस ढंग से प्रयोग में लाता है वहीं ढंग उस लेखक की शैली होती है | निबन्ध के अच्छे या बुरे सिद्ध होने में शैली का महत्त्वपूर्ण हाथ होता है । यह शैली मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है (1)सुबोध शैली, (2) अलंकृत शैली । सुबोध शैली वह है जिसमें बात सीधे-सादे ढंग से निर्धारित शब्दों में कह

दी जाय लेकिन अलंकृत शैली वह है जिसमें बात को भाषा के चमत्कार द्वारा सजा दिया जाये । जैसे- यह कहना कि ‘सूर्य निकल रहा था सुबोध शैली का स्वरूप है लेकिन इस बात को अलंकृत भाषा में इस प्रकार कहा जा सकता है – ‘भगवान भुवन-भास्कर अपने सुनहले हाथों के स्पर्श से समस्त प्राणिमात्र को स्पंदित कर रहे थे’ या ‘ऊषा नागरी आशा-घट को अम्बर पनघट में डूबो रही थी । सुबोध एवं अलंकृत शैलियों में भी भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से और उपभेद हो जाते हैं, लेकिन मुख्य बात यही है कि शैली या तो सादगी लिये होती है या चमत्कारपूर्ण भाषा का आवरण उसे अनोखा बना देता है । फिर भी अलंकृत शैली में लिखना पर्याप्त अभ्यास के पश्चात आता है, अतः विद्यार्थियों को सुबोध शैली में लिखते हुए अलंकृत शैली को ग्रहण करने का प्रयास करते रहना चाहिये । भाषा के सम्बन्ध में अनेक सावधानियों की आवश्यकता होती है।उनमें से प्रमुख बातें निम्नलिखित हैं-

1. भाषा सरल, सुबोध, प्रवाहमयी एवं सरस होनी चाहिए । विषयानुसार शब्द- चयन उचित होता है,लेकिन कर्णकटु शब्दों का प्रयोग अर्वांछनीय माना जाता है । भाषा में मध्यम मार्ग अपनाना उचित है । इसके अनुसार संस्कृत गर्भित या विदेशी भाषा से बोझिल भाषा नहीं होनी चाहिये । विदेशी शब्दों का प्रयोग वहाँ आवश्यक है जहाँ उचित हिन्दी शब्द अप्राप्य हों फिर भी विदेशी शब्दों को बहुवचन आदि में प्रयोग करने में हिन्दीकरण की नीति उपयुक्त होती है । स्टेशन का बहुवचन स्टेशनों ही उचित होगा । साथ ही आंग्ल भाषा के कुछ शब्दों की हिन्दी इतनी नीरस व दुरूह होती है कि ऐसे स्थानों में अंग्रेजी शब्द का प्रयोग सरल लगता है । अत ऐसे स्थानों में अंग्रेजी का मूल शब्द ही प्रयोग करना चाहिये । जैसे – ट्रेन को लौहपथ गामिनी लिखना निबन्ध में कर्कशता लाना हो जाता है।

2 वाक्य सीधे-सादे. छोटे एव क्रमबद्ध हों । सरल वाक्यों के बीच अत्यन्त दुरूह वाक्य लानाअनुपयुक्त होता है।

3. अपने मंतव्य के अनुसार जहाँ बल देने की आवश्यकता हो, वाक्य के उसी अश पर बल दिया जाय । वाक्य को प्रभावोत्पादक बनाने के लिए प्रश्न सूचक या विस्मयादि सूचक ढांचे में लिखा जाना चाहिये। जैसे-ऐसा कौन भारतीय है जिसे अपने देश के अतीत वैभव पर गर्व न हो?

4. मुहावरों, लोकोक्तियों एवं महापुरुषों की उक्तियों व प्रचलनों के साथ-साथ अलंकारों का प्रयोग संतुलित मात्रा में ही आवश्यक है । यह सभी तथ्य भाषा के श्रृंगार हैं । इनके प्रयोग से भाषा रूपवती गृहिणी के समान चित्ताकर्षक हो जाती है । फिर भी उक्तियों एवं अलंकारों का प्रयोग विषयानुसार ही होना चाहिए।

बाहुल्य प्रत्येक स्थिति में त्याज्य है ।

5. निबन्ध यदि वैचारिक है तो नीरसता को हटाने एवं ताजगी तथा सजीवता लाने के लिए

कभी-कभी हास्य-विनोद की सामग्री प्रस्तुत करना आवश्यक है लेकिन इसे संयत एवं शालीन होना चाहिये।

6 विचारों को स्पष्ट करने के लिए यदा-कदा उदाहरण देना आवश्यक है । गद्य में काव्य का माधुर्य लाने के लिए लाक्षणिक एवं व्यंजक शब्दों का प्रयोग आवश्यक है । वह मर गया के स्थान पर उसके प्राण पखेरू उड़ गये’ या ‘वह चिर निद्रा में डूब गया’ कहना युक्ति-युक्त है।

7. व्याकरण सम्बन्धी नियमों का पालन करना चाहिये।

8. भाषा के अनेक दोषों-पुनरुक्ति दोष, व्याकरण एवं अलंकार दोष एवं गवाँरूपन के दोष से बचना चाहिये । अप्रचलित परिपाटी को प्रोत्साहन देना अनुचित है । जैसे – किसी शब्द को एक ही स्थान पर दो बार लिखना दो के अंक लिखने से अच्छा माना जाता है । वह अच्छे निबन्ध लिखता है’ के स्थान पर आज

कल वह अच्छे-अच्छे निबन्ध लिखता है’ लिखना उचित समझा जाता है।

उपर्युक्त निर्देशों का सार यह है कि निबन्ध लिखना एक कला है और कला का प्राण सौन्दर्य है ।अतःजिस प्रकार सौन्दर्य लाया जा सके, वही प्रकार सर्वोत्तम है । लेकिन प्रारम्भ में विद्यार्थी को नियमों कासहारा लेनाआवश्यक है । अभ्यास के पश्चात् वह निबन्ध लेखन का अभ्यस्त हो जाता है और साधिकारलिखता है । जिस प्रकार शिशु को चलाने के लिए पहले खिलौना-गाड़ी का सहारा दिया जाता है. लेकिनकुछ समय बाद वह उन्मुक्त होकर दौड़ने लगता है । चूँकि उपदेश से उदाहरण अधिक प्रभावकारी होता है,

अतः अब कुछ चुने हुए निबन्ध विद्यार्थियों के मार्ग-दर्शन हेतु आगे दिये जा रहे हैं ।

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