Sarojni Naidu

सरोजिनी नायडू

हिंदी, हिंदी निबंध

आज हम एक सफल राजनेत्री, स्फूत्वक्ता, एवं सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू के बारे में कुछ जानकारियां अर्जित करेंगे जिन्हें “भारत की स्वर कोकिला” के नाम से भी जाना जाता है। बचपन से ही काव्य की ओर रुझान रखने वाली सरोजिनी नायडू ने अपने बाल्यकाल से ही कई कीर्तिमान स्थापित किए, उन्होंने अपने काव्य लेखन की प्रतिभा के दम पर छोटी सी उम्र में ही कई पदक हासिल कर लिए थे। इन्होंने नव वर्ष की अल्पायु में ही अपना लेखन कार्य आरंभ कर दिया था। कविता लेखन एवं काव्य पाठ में रुचि रखने के परिणाम स्वरूप इन्हें जल्द ही कई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त हो चुका था। 

जन्म एवं प्रारम्भिक शिक्षा

शब्दों में जीवन डाल देने वाली भारत मां की इस बेटी का जन्म सन 1879  ईस्वी को हैदराबाद के एक प्रसिद्ध बंगाली हिंदू परिवार में हुआ था। इनकी मां का नाम बराड़ा सुंदरी देवी चट्टोपाध्याय था, जो कि एक प्रसिद्ध बंगाली कवित्री थी। तथा उनके पिता का नाम अघोरनाथ चट्टोपाध्याय था जोकि हैदराबाद विश्वविद्यालय के एक कुशल प्रशासक के रूप में कार्यरत थे। सरोजिनी नायडू का प्रारंभिक नाम सरोजिनी चट्टोपाध्याय था। इनका सुविकसित मस्तिष्क तो मान लीजिए इन्हें विरासत में मिला था, क्योंकि इनके पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय ने एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त कर रखी थी। अपनी विशेष प्रतिभाओं से विद्यालय में शिक्षकों को आकर्षित करने वाली सरोजिनी चट्टोपाध्याय ने  हमारे देश को कुछ ऐसी उदारवादी एवं प्रगतिवादी रचनाएं उपहार स्वरूप दी, जो मानव जीवन को प्रगतिशील करने में सार्थक सिद्ध हुईं। पढ़ाई में प्रारंभ से ही अव्वल आने वाली सरोजिनी नायडू ने अपनी मैट्रिक की परीक्षा प्रथम स्थान से उत्तीर्ण की, किंतु कुछ कारणवश आगे की पढ़ाई में इन्होंने 4 वर्ष का अवकाश ले लिया। इसी बीच इन्होंने साहित्य की ओर अपना रुख करते हुए “मेहर – मुनीर” नामक एक नाटक की रचना की। इस नाटक को इनके पिता ने कई प्रतिलिपियों में छपवा कर विभिन्न लोगों में वितरित कर दी। इनमें से एक प्रतिलिपि हैदराबाद में निजामों  के बादशाह को भी मिली। इस नाटक को पढ़कर बादशाह काफी अभिभूत हुए एवं महज़ 16 वर्ष की बालिका सरोजनी नायडू को अपनी आगे की पढ़ाई करने के लिए सन 1895 ईस्वी में इंग्लैंड जाने का अवसर भी प्रदान किया। निजाम मीर महबूब ने इनकी पढ़ाई का सारा खर्चा अपने सर लिया, और लंदन के किंग्स कॉलेज में उनका दाखिला हो गया। कुछ दिनों बाद इन्हें कैंब्रिज कॉलेज जाने का भी अवसर मिला किंतु किन्ही कारणों बस वहां यह अपनी पढ़ाई पूरी ना कर सके और इन्हें उन्हें भारत लौटना पड़ा।

काव्यप्रेम

कविता के क्षेत्र में तो बाल्यकाल से ही इनके पर काफी ऊंची उड़ान भरने के लिए सक्षम थे। किंतु जब वे विदेश यात्रा पर गई और अंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं के कवियों से उनका मिलन हुआ, तब इन्होंने अपनी रचनाओं को उनके समक्ष प्रस्तुत किया। विदेशी कवियों ने इनकी रचनाएं पढ़ी और नव युवती सरोजिनी से काफी प्रभावित हुए, तथा उन्होंने ही इन्हें इनकी कविताओं में प्रकृतिवाद और भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता को पिरोने की सलाह दी। बचपन से ही हिंदी अंग्रेजी तेलुगू तमिल फारसी आदि कई अन्य अन्य भाषाओं मैं अच्छा ज्ञान होने के कारण इन्होंने कई भाषाओं में अपनी कविताओं तथा अन्य विधाओं पर काम किया। एक उत्कृष्ट कवियत्री एवं लेखिका के रूप में अपनी प्रसिद्धि बनाने वाली सरोजिनी नायडू की प्रमुख रचनाएं निम्नवत हैं__1. “The golden threshold” जो वर्ष 1905 में लंदन में प्रकाशित हुई।  2. “The bird of time” इस रचना का प्रकाशन वर्ष सन 1912 रहा। क्योंकि इस रचना में सरोजिनी नायडू ने मनुष्य के जीवन से लेकर मृत्यु तक की विवेचना की। तथा इसी के साथ उन्होंने कई रचनाएं जैसे, the broken wings, the fruit The feather of dawn, the Indian weavers आदि अनेक प्रसिद्ध रचनाएं प्रकाशित की। जिनमें से कुछ मुख्य रचना है तो ऐसी हैं जो आज भी विद्यालय में पाठ्यक्रम में शामिल की गई हैं।

वैवाहिक जीवन

 इंग्लैंड से भारत लौटते वक्त इनकी मुलाकात गोविंदराजुलू नायडू से हुई, कुशल व्यक्तित्व के धनी गोविंदराजुलू नायडू तथा सरोजिनी चट्टोपाध्याय ने एक दूसरे को बहुत ही शीघ्र पसंद कर लिया और दोनों ने एक दूसरे से विवाह करने का भी निश्चय किया। किंतु भिन्न जातियों से संबंध रखने वाले प्रेमियों के मन में उनके परिवारी जनों की नाराजगी का भूचाल उनके मन को अंदर ही अंदर कचोट रहा था। किंतु साल 1895 ईस्वी में दोनों परिवारों की सहमति से गोविंदराजुलू और सनी चट्टोपाध्याय का विवाह संभव हुआ। विवाह पश्चात इनका नाम सरोजनी चट्टोपाध्याय की जगह सरोजनी नायडू हो गया।

स्वतंत्रता आंदोलनों में सक्रिय योगदान

 भारत की कोकिला कहीं जाने वाली सरोजिनी नायडू ने ना केवल अपनी कलम की ही धार से राष्ट्र सेवा की, बल्कि सड़कों पर भी उतर कर इन्होंने स्वतंत्रता आंदोलनों में भाग लिया। साल 1905 ईसवी में ब्रिटिश सरकार द्वारा बंगाल को दो हिस्सों में बांट दिया गया, जिसका इन्होंने खुलकर विरोध भी किया और इन्हें काफी ठेस पहुंची। वर्ष 1920 में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में भी इन्होंने खुलकर भाग लिया और काफी समय तक आंदोलन का हिस्सा बनी रहीं। महात्मा गांधी के द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन एवं डांडी आंदोलन में भी सरोजिनी नायडू एक वृहत किरदार के रूप में सामने आई किंतु इन्हें ब्रिटिश सरकार द्वारा कारागार में डाल दिया गया। 

सम्मान एवं पुरस्कार

 साल 1925 ईस्वी में कांग्रेस ने इन्हें पहली महिला अध्यक्ष घोषित किया। अपने पद की गरिमा बनाए रखने के लिए इन्होंने पूरी निष्ठा के साथ देश की सेवा की। साल 1929 ईस्वी में इन्होंने दक्षिण अफ्रीका में पूर्व भारतीय अफ्रीकी कांग्रेस के अधिवेशन की अगुवाई की, और महिलाओं को वोट डालने का अधिकार भी तत्कालीन वर्ष में दिलवाया। वर्ष 1947 ईस्वी में देश की स्वतंत्रता हासिल होने के पश्चात इन्हें उत्तर प्रदेश की प्रथम महिला राज्यपाल बनाया गया, ना कि केवल उत्तर प्रदेश बल्कि यह पूरे भारतवर्ष की प्रथम महिला राज्यपाल थीं। महिलाओं के सम्मान में इससे ज्यादा कीर्तिमान क्या हो सकता है। इनके सम्मान के तौर पर कई महाविद्यालय तथा चिकित्सालय हमारे समूचे देश में चल रहे हैं -जैसे सरोजिनी नायडू स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड कम्युनिकेशन, सरोजिनी नायडू महिला महाविद्यालय, सरोजिनी नायडू नेत्र चिकित्सालय, एवं सरोजिनी नायडू चिकित्सा विद्यालय आदि इमारतों की दीवारें भी सरोजिनी नायडू के भारत के कण-कण में जीवित होने का आभास कराती रहतीं हैं।

मृत्यु

 2 मार्च सन 1999 ईस्वी को भारत भाग्य का एक ऐसा दिन आया जब लखनऊ विश्वविद्यालय में अपराहन 3:30 बजे भारत की बेटी सरोजिनी नायडू की कलम सदा सदा के लिए बंद हो गई, सरोजिनी नायडू आज हमारे बीच ना होकर भी हम सबके हृदय में वास करती हैं, आप जैसी दिव्य आत्माओं का जन्म इस पृथ्वी पर किसी विशेष कार्य के लिए ही होता है।

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