Samrat Ashok

सम्राट अशोक

हिंदी, हिंदी निबंध

चक्रवर्ती सम्राट अशोक आज के वक्त में युवाओं के लिए सबसे बड़ी प्रेरणा एवं आदर्श हैं। उनके समूचे जीवन से बहुत बड़ी सीख तथा मर्यादित ज़िंदगी जीने की विभिन्न गूढ़ कलाएं मिलती है, जिनको अपना कर युवा पीढ़ी एक आदर्श एवं स्वाभिमानी जीवन व्यतीत कर सकती है।

जीवन परिचय

सम्राट अशोक प्राचीन भारत के तीसरे शक्तिशाली मौर्यवंशी शासक थे। जिनकी राजधानी पाटलिपुत्र वर्तमान (पटना) थी। चक्रवर्ती सम्राट अशोक का पूरा नाम देवनाम्प्रिय अशोक मौर्य था। अर्थात अशोक को देवों के प्रिय व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता था। लगभग समूचे भारतवर्ष पर राज्य करने वाले अशोक मौर्य को एक बहुत ही निर्दयी शासक के रूप में जाना जाता है। युद्ध में शत्रु इनके समक्ष आते ही कांप उठता तथा कई युद्ध यह बिना लड़े ही जीत गए। किंतु इनके राज्य में प्रजा सुखी हुआ करती थी। अपने प्रारंभिक जीवन तथा अंतिम जीवन में यह बहुत ही करुणा में एवं दयावान रहे किंतु मध्य में आसपास के वातावरण में फैली बुराइयों ने इन्हें चण्ड बना दिया। सम्राट अशोक एक बलशाली बुद्धिमान शौर्यवान एवं कीर्तिमान योद्धा थे। कहा जाता है कि इनके अंदर अपार बल होने के कारण यह शेर को एक छड़ी से ही मार गिराने की शक्ति रखते थे। सम्राट अशोक ने अखंड भारत पर राज्य किया था अपना साम्राज्य हिंदू कुश की पहाड़ियों से लेकर, मैसूर बांग्लादेश तथा अन्य देशों में विस्तृत किया।

जन्म एवं बाल्यकाल

देवनामप्रिय अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व भारतवर्ष के एक सुप्रसिद्ध मौर्य वंश में हुआ, सम्राट अशोक अखंड भारत के निर्माता चंद्रगुप्त मौर्य के पुत्र तथा तात्कालिक सम्राट बिंदुसार तथा रानी धर्मा के पुत्र थे। क्योंकि सम्राट बिंदुसार के कुल 101 पुत्र होने का वर्णन मिलता है, जिनमें से कुंवर सुशील ज्येष्ठ होने के नाते उत्तराधिकार की लड़ाई में सबसे आगे था। किंतु मगध की प्रजा अपना उत्तराधिकारी अतुल्यतेज वान, अप्रतिम योद्धा, अशोक मौर्य में देखती थी। क्योंकि सुशील जेष्ठ पुत्र तो अवश्य था किंतु वह दानवी गुणों से परिपूर्ण एक आतताई राजकुमार था। तथा कुमार अशोक मौर्य धर्मपुत्र, सत्य निष्ठ, प्रजा पालक, बुद्धिजीवी, सुकोमल हृदय वाला राजकुमार था। अपने 100 भाइयों में अशोक मौर्य एक ऐसा राजकुमार था जिसकी मां क्षत्राणी ना होकर ब्राह्मणी थी, देव राजपूतानी ना होने के कारण उसे महल में विशेष स्थान प्राप्त नहीं था। क्योंकि सम्राट बिंदुसार ने अशोक की मां धर्मा सुभद्रंगी से वन में प्रेम विवाह किया था। जिसके फलस्वरूप उन्हें सभी के जीवन से शुरू करने वाले अशोक जैसे पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।  अपने भाइयों से स्पर्धा में अशोक सदा विजई होता आया था। अशोक के बारे में विद्वानों तथा इतिहासकारों से कहा द्वारा कहा जाता है, कि वह बाल्यकाल से ही तीरंदाजी तलवारबाजी आदि युद्ध कौशल में श्रेष्ठ प्रदर्शन देता था। अशोक ने अपनी बाल्यावस्था में ही तक्षशिला के प्रांत पाल कीचक द्वारा वहां की प्रजा को प्रताड़ित किए जाने पर उसका अंत करने का निश्चय किया। और किसी जैसे निष्ठुर आतताई का दमन करके तक्षशिला में शांति की स्थापना की। इस साहसिक कार्य से सम्राट बिंदुसार अत्यधिक प्रसन्न हुए और अशोक को तक्षशिला का नया प्रांत पाल बनाने का निर्णय लिया। इसी बीच तक्षशिला भ्रमण पर आए कलिंग की राजकुमारी कोरबा की से अशोक को प्रेम हो गया, और यह प्रेम प्रसंग अशोक के जीवन के अंत तक चलता रहा। बताया जाता है कि, कोरबा की अशोक की दूसरी रानी थी।

साम्राज्य विस्तार

सिंहासन की स्पर्धा में कुल 101 भाइयों ने अपनी अपनी चालें चली, किंतु कुंवर सिंह अशोक पर कई झूठे आरोपों द्वारा जैसे राज्य के नियमों का हनन आदि को सच साबित करके राजकुमार अशोक को कारागार में डलवा दिया। उज्जैनी के प्रांत पाल ने उज्जैन में आतंक मचा रखा था, जिसके चलते सम्राट बिंदुसार ने कुंवर सुशीम को उज्जैन में शांति स्थापित करने के लिए भेजा, किंतु सुशील विद्रोहियों को रोकने में असफल रहा।  परिणाम स्वरूप सम्राट बिंदुसार ने सुशील से गुप्त रहकर अशोक को कारागार से बाहर निकलवा लिया और उज्जैनी में शांति की स्थापना के लिए अशोक को उज्जैन भेजा। अशोक ने अपना वेज परिवर्तित करके उज्जैन में प्रवेश किया तथा प्रांत पाल द्वारा किए जा रहे अत्याचारों से प्रजा को निजात दिलाई। राजकुमार अशोक बौद्ध भिक्षु के रूप में काफी दिनों तक पाटलिपुत्र में भ्रमण करते रहे।

उन भूतों की टोली में देवी नाम की एक लड़की से इन्हें प्रेम हो गया, तथा उससे अशोक ने विवाह कर लिया।                          वृद्धावस्था के साथ-साथ सम्राट बिंदुसार के वृद्ध अवस्था के चलते प्रजा में बढ़ते सुसीम के आतंक से  त्राहि-त्राहि मची हुई थी। प्रजा की ऐसी दुर्दशा अशोक से देखी नहीं जा रही थी, इसी बीच पता चला कि महल में रानी धर्मा को सुशीम तथा अन्य भाइयों ने गला रेत कर मर डाला।  अपनी मां की मृत्यु का समाचार सुनकर अशोक का हृदय खंडित हो गया। और अशोक अब सचमुच चण्ड बन चुके था। अशोक ने अपनी मां की मृत्यु का प्रतिशोध लेने के लिए अपने सभी भाइयों की हत्या करने की शपथ ली। अपने छोटे भाई विद अशोक को छोड़कर अशोक ने कुल 99 भाइयों को एक-एक करके मौत के घाट उतार दिया। इसके पश्चात अब अशोक अखंड भारत के चण्ड सम्राट बन चुका था।                              

कुछ वर्षों के पश्चात सिंहासन पर बैठते ही सम्राट अशोक ने पूर्व से लेकर पश्चिम, उत्तर से लेकर दक्षिण तक अपना साम्राज्य विस्तृत किया। यहां तक कि ईरान से लेकर अफगान, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, के साथ संपूर्ण भारत पर एकाधिकार कर मौर्य वंश का परचम लहरा दिया। अशोक का साम्राज्य तब से लेकर आज तक का सबसे विस्तृत एवं शक्तिशाली साम्राज्य रहा।  चक्रवर्ती सम्राट महान अशोक विश्व के महान राजाओं की श्रेणी में सदैव शीर्ष पर ही रहेंगे।  सम्राट अशोक भारतवर्ष के सरस्वती शाली राजाओं की श्रेणी में एक विशेष स्थान रखते हैं, अर्थात इन्हें चक्रवर्ती सम्राट के नाम से जाना जाता है, जो  भारत वर्ष के इतिहास में एकलौता शासक रहा।

कलिंग का युद्ध

सम्राट अशोक के जीवन से संबंधित सबसे प्रमुख युद्ध को कैसे भुलाया जा सकता है, शिलालेखों के अनुसार बताया जाता है कि सम्राट अशोक ने कलिंग पर एक लाख 50,000 से अधिक सैनिकों को लेकर आक्रमण किया।  और उसे भारतवर्ष के नक्शे से नेस्तनाबूद करने की शपथ ली। कलिंग के इस महा विनाशकारी युद्ध में लगभग एक लाख से ऊपर सैनिकों के प्राण गए, तथा असंख्य निर्दोष बच्चे महिलाएं काल के गाल में समा गए। संपूर्ण कलिंग रक्तरंजित था, ऐसा भयानक  नरसंहार देखकर सम्राट अशोक की आत्मा चीख उठी, और हृदय में करुणा का प्रस्फुटन हुआ।  इस युद्ध से द्रवित होकर चक्रवर्ती अशोक शांति की खोज में निकल पड़े, तथा सदेव के लिए शास्त्रों को त्याग दिया।  

बौद्ध धर्म को स्वीकृति

कलिंग के युद्ध में रक्तरंजित जनमानस को देखकर उसका मन द्रवित हो उठा, और शांति प्राप्ति के लिए उसने भगवान बुद्ध के दिए गए निर्देशों का पालन किया। तथा बौद्ध धर्म के आचरणों को स्वीकार कर लिया। अब सम्राट अशोक ने विदेशों में जाकर बौद्ध धर्म का प्रसार किया, तथा जीव हत्या शिकार आदि सबकुछ अशोक ने त्याग दिया।           

मृत्यु

लगभग 36 वर्षों तक अखंड भारत पर राज्य करने वाले, तथा विश्व का बहुत बड़ा भूभाग एक छत्र के नीचे करने वाले अतुल्य शौर्यवान, चक्रवर्ती सम्राट, देवनाम्प्रिया,( देवों का प्रिय) अशोक की मृत्यु 232 ईसा पूर्व हुई।  मां भारती का यह वीर सपूत अपने शिलालेखों एवं प्राप्त उपलब्धियों में सदैव के लिए अमर हो गया।

सम्राट अशोक के जीवन की बड़ी सीखें

  1. एक मर्यादित, सौम्य एवं स्वाभिमानी जीवन जीना।
  2. हिम्मत, शौर्य और पराक्रम के साथ जीवन का हर युद्ध लड़ना और विजय पाना।
  3. जीवों और समस्त प्रकृति से प्रेम करना एवं उनका संरक्षण करना।
  4. जीवन में आध्यात्म को यथोचित स्थान देकर आदर्श जीवन व्यापन करना।
  5. मातृभूमि की रक्षा के लिए स्वयं को न्योछावर कर देना।

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