RajaRamMohanRai

राजा राम मोहन राय

हिंदी, हिंदी निबंध

राजा राम मोहन राय एक ऐसा नाम जिसने  सती प्रथा,बाल विवाह जैसे घृणित प्रथाओं का सिर्फ विरोध ही नहीं किया, वरन समाज में फैली बुराई से निजात पाने के लिए विधवा पुनर्विवाह का जमकर समर्थन भी किया। राजा राम मोहन राय मूर्तिपूजा पर विश्वास नहीं करते थे,बहुदेववाद का इन्होंने विरोध भी किया। तथा राजा राम मोहन राय ने एकेश्वरवाद को बढ़ावा दिया। तथा ये पौराणिक एवं वेद शास्त्रों के तर्क पर आधारित नियमो को मानने वाले थे। इन्होंने इश्वर को  सर्वशक्तिमान अनंत तथा शाश्वत बताया। उस समय ईसाइयों द्वारा हिंदू धर्म के प्रति फैलाए जा रहे घृणित झूठी, मनगढ़ंत अवधारणाओं के विरोध में राजा राम मोहन राय ने सड़क पर उतरकर विरोध किया। 

 जन्म एवं बाल्यकाल

महान समाज सुधारक एवं सतिप्रथा प्रवर्तक श्री राजा राम मोहन राय का जन्म  22 मई सन् 1772 ईस्वी को हुगली के निकटवर्ती राधानगर (वर्तमान मुर्शिदाबाद “पश्चिम बंगाल” ) में स्थित  गांव के एक संपन्न ब्राह्मण परिवार में हुआ। राजा राम मोहन राय के पिता पंडित रमाकांत राय अपने पांडित्य में काफी लोकप्रिय थे।तथा अच्छे ज्ञानी भी थे। तथा इनकी मां तारिणी देवी एक विनम्र, शांतिप्रिय एवं धर्म के प्रति जागरूक प्रकृति की महिला थीं। राजा राम मोहन राय बाल्यावस्था से ही अपनी अप्रतिम प्रतिभाओं से लोगों को चकित करते आ रहे थे। महज पंद्रह वर्ष की कम आयु में ही इन्होने हिंदी सहित अरबी, बांग्ला, फारसी इस्लामी आदि अनेक विदेशी भाषाओं और सभ्यताओं के बारे में अधिकतम ज्ञान प्राप्त कर लिया था।                          

 शिक्षा

राजा राम मोहन राय की आरंभिक शिक्षा पटना के एक निजी विद्यालय में हुई तथा बाद में इन्होंने 4 वर्ष काशी में रहकर भारतीय साहित्य एवं वेद शास्त्रों का विस्तृत अध्ययन किया।                    

पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव

यह उस समय की बात है जब राजा राम मोहन राय ने ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी की। सन् 1805 से सन् 1814 ईस्वी तक इन्होंने अपना समय ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया। फलस्वरूप इन्होंने पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त की। तब उन्हे ये आभास हुआ कि भारतीय संस्कृति को उत्तम सभ्यता बनाने के लिए हमें अंग्रेजी का ज्ञान होना भी जरूरी है। जिससे भारतीयों के जीवन स्तर को और ऊंचा किया जा सके।अतएव ये भारतीय शिक्षा प्रणाली में अंग्रेजी के निवेश के पक्षधर थे। इसी बीच समाज में फैली कुरीतियों से आहत होकर सन 1814 ईस्वी में इन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। और सामाजिक कुप्रथाओं का अंत करने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।                                 

सती प्रथा का विरोध एवम् अंत

भारतीय समाज में विकराल रूप ले चुकी कुप्रथा (वस्तुतः जिसे हम सती प्रथा के नाम से जानते हैं) यह अत्याचार से परिपूर्ण तथा स्त्री पर होने वाले अत्याचारों का एक ऐसा दर्पण है, जिसमें पति की मृत्यू के बाद पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध जबरन अपने पति के साथ चिता की धधकती हुई ज्वाला में आहूत कर दिया जाता था। राजा राम मोहन राय के जीवन में भी   कालचक्र की गति धीमी न पड़ी, और संयोगवश एक ऐसा दिन आया -जब राजा राम मोहन राय के ज्येष्ठ भाई का निधन हो गया और सामाजिक कुरीतियों के वशीभूत परंपराओं के कुछ ठेकेदारों ने मोहनराय के समक्ष उनकी भाभी को उसकी इक्षा के विरुद्ध सती प्रथा की इस धधकती हुई अग्नि का निवाला बना दिया गया। उस समय राजा राम मोहन राय के हृदय में संवेदना तथा सती प्रथा जैसी बुराई के प्रति घृणा चरम पर थी। उनकी आंखो में सती प्रथा के अंत के लिए कटिबद्धता साफ नजर आ रही थी।अपने अटल संकल्प को क्रियान्वित करने के लिए तथा सती प्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर “लॉर्ड विलियम बैंटिक” के सहयोग से सती प्रथा के विरुद्ध कानून बनवाया।   समूचे भारत में घूम घूम कर लोगो के पास जाकर उन्होंने जनजागरण का कार्य किया।  अपने अटल संकल्प तथा पूर्ण समर्पण के बलबूते इन्होंने सती प्रथा का सदा सदा के लिए अंत कर दिया।

अन्य आंदोलन

सती प्रथा के अंत के साथ साथ इन्होने अनेक समाज सुधारक कार्यक्रमों का क्रियान्वयन किया। जिनमें से कुछ प्रमुख -बाल विवाह, जाति प्रथा, बहुविवाह का भी उन्होंने जमकर विरोध किया। इसके साथ साथ इन्होने नारी शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह का पूर्ण समर्थन भी किया।                   

ब्रह्म समाज की स्थापना

राजा राम मोहन राय द्वारा चलाए गए आंदोलनों में से ब्रह्म समाज की स्थापना  प्रमुख है।  सन् 1828 ईस्वी में इन्होंने ब्रह्म समाज नामक संस्था की स्थापना की। जिसमें महिलाओं के सम्मान की खातिर इन्होंने कुछ नियम अंगीकृत किए। ब्रह्म समाज की स्थापना को भारत के सामाजिक,धार्मिक आंदोलनों में विशेष स्थान प्राप्त है। 

स्वतंत्रता आंदोलन में समर्थन

राजा राम मोहन राय में समाज सुधार के साथ साथ राष्ट्रभक्ति की भी प्रबल भावना थी। अतः राजा राम मोहन राय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय समर्थक थे। भारतवर्ष की स्वतंत्रता की लड़ाई में राजा राम मोहन राय का अहम योगदान रहा।

राजा की उपाधि

 समाज सुधारक राजा राम मोहन राय को सर्वप्रथम राजा कहकर किसने नवाजा? यह एक रुचिकर प्रश्न हो सकता है।    बता दें -अन्तिम मुगल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र जो भारत स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सदस्य भी थे,उनके पिता (अकबर द्वितीय) ने जो ब्रिटिश सरकार द्वारा दी जा रहीं पेंशन पर निर्भर थे। राजा राम मोहन राय ने इनकी पेंशन की बढ़ोत्तरी के मामले में इंग्लैंड जाकर अंग्रेजी सरकार के समक्ष याचिका प्रस्तुत की, इनके इस कार्य से प्रसन्न होकर नवाब अकबर द्वितीय ने इन्हे राजा कहकर सम्बोधित किया।                         

मृत्यु

भारत भूमि के इस महान सपूत, श्रेष्ठ समाज सुधारक राजा राम मोहन राय की 27 सितंबर सन् 1833 ईस्वी को यूरोप में मृत्यु हो गई। किंतु अपने आंदोलनों के जरिए इस महामानव ने जनमानस के हृदयों में अपना विशेष स्थान बना लिया। इनका संपूर्ण जीवन समाज सुधार एवं  नारी के उत्थान के लिए समर्पित रहा।

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