मदर टेरेसा पर निबंध | Essay on Mother Teresa

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नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से जानी जाती हैं, मदर टेरेसा मानवता के प्रति प्रेम, ममता, सेवा और करूणा की प्रतिमूर्ति थीं। मदर टेरेसा का नाम ऐसे लोगों के साथ लिया जाता है, जो सिर्फ दूसरों के लिए जीते हैं। उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा और देखभाल करने में लगा दिया, वह मानवता की एक मिसाल थीं। हालांकि मदर टेरेसा मूलरूप से भारतीय नहीं थी पर उन्होंने अपना सारा जीवन भारत में ही बिताया और लोगों की सेवा करती रहीं।

आरंभिक जीवन

मदर टेरेसा का जन्म एक अल्बेनियाई परिवार में 26 अगस्त 1910 को स्कॉप्जे में हुआ था। इनके बचपन का नाम आन्येजे गोंजा बोयाजियू था, इनके पिता एक छोटे व्यवसायी थे और जब वह 8 साल की थीं उस वक्त ही उनके पिता का निधन हो गया था। मदर टेरेसा बचपन से ही अध्ययनशील और परिश्रमी लड़की थीं, उनको पढ़ने के साथ ही संगीत गाना भी बेहद पसंद था। 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने तय कर लिया था कि वह अपना सारा जीवन लोगों की सेवा में लगायेंगी, 1928 में 18 वर्ष की उम्र में ही मदर टेरेसा घर से निकल गयीं और ‘सिस्टर्स आप लोरेटो’ में शामिल हो गईं और आयरलैंड चलीं गईं, जहां उन्होंने अंग्रेजी भाषा सीखी क्योंकि भारत में लोरेटो की सिस्टर्स की शिक्षा भाषा अंग्रेजी थी।

लोगों की सेवा करने का विचार करने के बाद उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को पहनना छोड़ कर नीले किनारों की साड़ी पहनना शुरू कर दिया और उसके बाद से मानवता के कार्य में लग गईं। आयरलैंड से लौटकर मदर टेरेसा 6 जनवरी 1929 को कोलकाता के ‘लोरेटो कॉन्वेंट’ पहुंची, जिसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के एक अस्पताल से नर्सिंग की ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में लौटकर कोलकाता आईं और वहां आकर 1948 में उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के लिए एक स्कूल खोला। 1950 में मदर टेरेसा ने कोलकाता में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की।

मिशनरीज ऑफ चैरिटी

मदर टेरेसा ने 1948 में गरीबों के साथ में मिशनरी के कार्य को शुरू किया था, उन्होंने पारंपरिक वस्त्रों को छोड़कर नीली किनारों वाली सफेद सूती साड़ी पहनना शुरू कर दिया था और साथ ही उन्होंने भारत की नागरिकता को भी ले लिया। गरीबों और भूखों की देखभाल शुरू करने से पहले उन्होंने कोलकाता के मोतीझील में एक स्कूल की स्थापना भी की थी।

मदर टेरेसा के द्वारा किए जा रहे प्रयासों ने देश के प्रधानमंत्री समेत अन्य अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया। मदर टेरेसा को पहले एक साल काफी सारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा, कोई आय का स्रोत ना होने की वजह से उन्होंने भीख भी मांगी। 7 अक्टूबर 1950 को मदर टेरेसा को मिशनरीज ऑफ चैरिटी खोलने की अनुमति प्राप्त हुई, उनके अनुसार यह चैरिटी भूखे, बेघर, अपंग, , कुष्ठ रोगियों और उन सभी लोगों की देखभाल करेगा, जो कि पूरे समाज में अप्रसन्न और उपेक्षित महसूस करते हैं। 1997 तक कोलकाता की 13 सदस्यीय मंडली 4000 से अधिक सिस्टर्स तक बढ़ गई जो कि दुनिया भर में अनाथालयों और धर्माश्रम केंद्रों को चलाती थीं। मिशनरीज ऑफ चैरिटी में 2007 तक दुनिया भर में 450 भाई और 5000 बहनें थीं जो कि 120 देशों में 600 से अधिक संस्थानों का संचालन कर रहे थे।

आजीवन सेवा का संकल्प

सन् 1981 में उन्होंने अपना नाम बदलकर टेरेसा रख लिया और आजीवन सेवा करते रहने का संकल्प लिया। मदर टेरेसा ने गरीब और पीड़ितों की बिना किसी पक्षपात के जीवन भर सेवा की, उन्होंने एक दूसरे के प्रति सद्भाव बढ़ाने के लिए विश्वभर का दौरा किया। मदर टेरेसा का कहना था कि सेवा का कार्य करने के लिए सभी के सहयोग की आवश्यकता है क्योंकि यह एक कठिन कार्य है और इस कार्य को वही लोग कर सकते हैं, जो लोगों के ऊपर प्यार और सांत्वना की वर्षा कर सकते हैं- इसके लिए भूखे लोगों को खिलाएं और अपाहिजों को हर समय दिल से लगाने के लिए तैयार रहें।

पुरस्कार व सम्मान

मदर टेरेसा को उनके निस्वार्थ भाव द्वारा की गई सेवाओं के लिए कई सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा उन्हें 1962 में पद्मश्री से नवाजा गया, 19 दिसंबर 1979 को मानव कल्याण के कार्यो के लिए उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया। अमेरिका के कैथोलिक विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि भी दी गई, नोबेल पुरस्कार पाने वाली वह तीसरी भारतीय नागरिक थीं।

वेटिकन सिटी में पोप फ्रांसिस द्वारा 9 सितंबर 2016 को मदर टेरेसा को संत की उपाधि से सम्मानित किया गया।

निधन

मदर टेरेसा को 1983 में रोम में पहला हर्ट अटैक हुआ और उसके बाद सन् 1989 में मदर टेरेसा को दूसरा हर्ट अटैक भी आया। हालत बिगड़ने के बाद 13 मार्च 1996 को उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुख्य पद से इस्तीफा दे दिया और कुछ दिनों बाद 5 सितंबर 1996 को उनकी मृत्यु हो गई।

मदर टेरेसा ने जीवन भर अपनी परवाह किए बगैर लोगों की निस्वार्थ सेवा की, वह आज भी लोगों के लिए एक आदर्श हैं। उनके द्वारा किए गए कार्यों की वजह से वह गरीबों के लिए मसीहा थीं।

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