लोकमान्य तिलक | Essay on Lokmanya Tilak in Hindi

हिंदी, हिंदी निबंध

लोकमान्य तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 में महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था । इनका पूरा नाम बालगंगाधार तिलक था | रत्नागिरी के शिक्षक और संस्कृत विद्वान पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक और माता पार्वती बाई गंगाधर के घर जन्मे तिलक शुरुआत से ही अन्याय के घोर विरोधी थे। 1905 के बंग भंग आंदोलन के बाद वे एक प्रखर और प्रमुख राजनेता के रूप में उभरे और उन्हें “लोकमान्य” के शीर्षक से भी सम्मानित किया गया, जिसका अर्थ है “लोगों द्वारा स्वीकार किया गया ( नेता के रूप में)”। महात्मा गांधी उन्हें “आधुनिक भारत का निर्माता” कहते थे।

शिक्षा

तिलक ने प्रारंभिक शिक्षा  के बाद डेक्कन कॉलेज से बीए की परीक्षा गणित विषय में प्रथम श्रेणी से पास की और बाद में एलएलबी की डिग्री गवर्मेंट लॉ कॉलेज , मुंबई से हासिल की । लोकमान्य तिलक की प्रसिद्धि अपने पिता की ही तरह  सर्वाधिक शिक्षक के रूप में ही की थी लेकिन देश की स्थिति को देखते हुए उन्होंने 19वीं सदी के आखिरी सालों में स्वदेशी का नारा लेकर महाराष्ट्र के गांव गांव घूमने लगे । उन्होंने सभी को एक स्पष्ट संदेश दिया कि  स्वराज ही जन्मसिद्ध अधिकार है और इसका समय लेने का समय अब आ चुका है । अंग्रेज़ उन्हें “भारतीय अशान्ति के पिता” कहते थे । 1890 से ही वे कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए थे।

स्वतंत्रता संग्राम में तिलक की भूमिका

1897 में  जनता को भड़काने के आरोप में जेल हुई थी। ,1909  में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने बम फेंकने के कारण उन्होंने “भारत के दुर्भाग्य ” लेख लिखे थे।  जिसके कारण उन्हें देशद्रोह के आरोप में अलीपुर केस में मुकदमा चला और जेल की सजा हुई। केसरी के पत्र में लोकमान्य तिलक एकमात्र ऐसे लेखक थे जिन्होंने बताया कि बम फेंकना बच्चों का स्वतंत्रता लेने का हक है । तिलक के एक पुकार पर जनता एकजुट हो जाती  थी। पत्रिका केसरी में तिलक ने अंग्रेजी नीतियों की पोल खोल दी थी।  एक लेख लिखा गया था जिसका शीर्षक था ” देश का दुर्भाग्य ” । जिससे अंग्रेज तिलमिला उठे थे और तिलक पर राजद्रोह का आरोप लगा दिया। उन्हें 6 सालों के लिए बर्मा के मांडले जेल में कैद कर दिया गया था । तिलक ने ही स्वतंत्रता संग्राम को स्वराज की दिशा दी थी । 1916 में तिलक ने अपने साथियों के साथ मिलकर होमरूल लीग की स्थापना की थी।

स्वतंत्रता संग्राम में तिलक की भूमिका

वे हमेशा ही शिक्षा के माध्यम से लोगों को सहज बनाना चाहते थे।लेनिन ने भी तिलक के विचार को प्रोत्साहित किया था।  भारतीय क्रांति के जनक लोकमान्य तिलक उस समय भी शिक्षा को लेकर हमेशा अपने लेख में लिखते रहते थे कि शिक्षा  जो सभी मूलभूत सुविधाएं और स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आसान हथियार है। स्वराज ,स्वदेशी,  स्वशिक्षा, बहिष्कार यह चार लोकमान्य तिलक खुद के  हथियार मानते  थे। लोकमान्य तिलक को हम उस योगदान से भी जानते हैं जिसने  स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को बदल कर रख दिया । उनका यह नारा की” स्वराज हर मनुष्य का जन्म सिद्ध अधिकार है”  आज भी बार-बार दोहराया जाता है।

तिलक : एक युगपुरुष

तिलक एक महान पत्रकार और शिक्षाविद भी थे।  होम रूल लीग स्वराज के पड़ाव में एक अहम सीढ़ी थे तिलक । केंद्रीय असेंबली से लेकर क्षेत्रीय सरकार तक भारतीय भागीदारी को ज्यादा से ज्यादा आगे बढ़ाने का कोशिश करते रहे थे। बांटो और राज करो की नीति के खिलाफ तिलक ने एकता की कोशिशों  अंतिम सिरे तक पहुंचाने की हर संभव कोशिश की  थी । लखनऊ पैक्ट, खिलाफत आंदोलन और असहयोग आंदोलन के दौरान  महात्मा गांधी का कहना था  तिलक आधुनिक भारत के निर्माता हैं।

बाल गंगाधर तिलक ने यही एकता आगे चलकर गुलाम भारत के आजादी के संघर्ष ने में बेजोड़ हथियार साबित हुआ।उनका मानना था कि देश के गुलाम की जंजीरों को तोड़ना ही होगा ।  जिसकी शुरुआत उन्होंने की शिक्षा से,  भारतीय संस्कृति और आदर्शों आधार बनाकर ना सिर्फ एक नई शिक्षा पद्धति की शुरुआत की । बल्कि डेक्कन एजुकेशन सोसायटी स्थापना कर युवाओं के लिए उच्च स्तर की स्वदेशी शिक्षा के दरवाजे भी खोल दिए।  तिलक को लगता था कि भारतीयों पर हो रहे अत्याचार आकांक्षा और संघर्ष की कहानी सब तक पहुंचनी चाहिए । लोकमान्य तिलक एक पत्रकार भी थे इनका मराठी साप्ताहिक पत्र केसरी की आवाज के रूप में सामने आया था । इसका अंग्रेजी संस्करण भी निकाला गया था ताकि वह  देश को जगा सके।

महाराष्ट्र में गणेश उत्सव बहुत पहले से ही मनाया जाता आ रहा  था पर सार्वजनिक तौर पर तिलक ने ही उसे राजनीतिक रूप देकर उत्सव के जैसे 1894 में शुरुआत की । तिलक ने गणेश चतुर्थी और शिवाजी जयंती को जनता से जोड़ा उनका मानना था कि स्वराज ही सबसे ऊपर है । तिलक गरम दल का नेतृत्व भी करते थे । तिलक ने डेक्कन एजुकेशन सोसाइटी की भी स्थापना की थी और उनका कहना था कि स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर ही रहूंगा। अर्थात हर मनुष्य का जन्म से ही स्वतंत्र लरहने का अधिकार है।  उनकी तमाम बातें आज भी युवाओं को प्रेरित करती है। लोकमान्य तिलक का निधन 1 अगस्त 1920 को मुंबई में हुआ।

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