समास,समास की परिभाषा, प्रकार और उदाहरण

हिंदी, हिंदी व्याकरण

हिंदी व्याकरण के महत्वपूर्ण अध्याय ‘समास को परिभाषा सहित और उसके भेद (प्रकार) को उदाहरण सहित समझने के लिए यह पर समास प्रकरण को विस्तार में समझाया गया है। यहाँ हिंदी समास के विषय में सम्पूर्ण जानकारी उदाहरण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। हम आशा करते हैं की हिंदी व्याकरण का ‘समास’ अध्याय आपको पूर्ण रूप से समझ आएगा। आपको ये अध्याय कैसा लगा, कमैंट्स में हमे जरूर बताएं। हिंदी पराग को अच्छा और उपयोगी बनाने के लिए आपकी प्रतिक्रिया हमें सहायक होगी।

अर्थ और परिभाषा

समास का शाब्दिक अर्थ होता है ‘संक्षिप्ति’। दूसरे शब्दों में— समास संक्षेप करने की एक प्रक्रिया है।दो या दो से अधिक शब्दों का परस्पर सम्बन्ध बतानेवाले शब्दों अथवा प्रत्ययों का लोप होने पर उन दो अथवा दो से अधिक शब्दों के मेल से जो एक स्वतन्त्र शब्द बनता है, उस शब्द को सामासिक शब्द कहते हैं और उन दो अथवा दो से अधिक शब्दों का संयोग समास कहलाता है।

उदाहरण – ‘ज्ञानसागर’ अर्थात् ‘ज्ञान का सागर’। इस उदाहरण में ‘ज्ञान’ और ‘सागर’, इन दो शब्दों का परस्पर सम्बन्ध बतानेवाले सम्बन्धकारक के ‘का’ प्रत्यय का लोप होने से ‘ज्ञान-सागर’ एक स्वतन्त्र शब्द बना है।

हिंदी समास के कुल ६ भेद-

१- अव्ययीभाव समास

२- तत्पुरुष समास

३- कर्मधारय समास

४- द्विगु समास

५- द्वन्द्व समास

६- बहुव्रीहि समास

१- अव्ययीभाव समास – जिस समास में प्रथम पद प्रधान हो और वह क्रिया-विशेषण अव्यय हो, उसे ‘अव्ययीभाव’ समास कहते हैं।

प्रतिवर्ष – वर्ष-वर्ष

प्रतिदिन – दिन-दिन

यथाशक्ति – शक्ति के अनुसार

यथाविधि – विधि के अनुसार

यथाक्रम – क्रम के अनुसार

प्रत्येक – एक-एक के प्रति

बारम्बार – बार-बार

आजन्म – जन्मपर्यन्त

भरपेट –  पेट-भर

परोक्ष – अक्षि के परे

२- तत्पुरुष समास – जिस समास में पूर्व-पद गौण रहता है तथा उत्तर-पद प्रधान, उसे ‘तत्पुरुष’ समास कहते है। कारक-चिह्नों के अनुसार इसके अग्रलिखित छह भेद होते हैं :-

द्वितीया तत्पुरुष समास (कर्म तत्पुरुष- को)

सुखप्राप्त – सुख को प्राप्त करनेवाला

माखनचोर – माखन को चुरानेवाला

पतितपावन – पापियों को पवित्र करनेवाला

स्वर्गप्राप्त – स्वर्ग को प्राप्त करनेवाला

चिड़ीमार – चिड़ियों को मारनेवाला

मुँहतोड़ – मुँह को तोड़ने वाला

तृतीया तत्पुरुष समास (करण तत्पुरुष- से)

नेत्रहीन – नेत्र से हीन

ईश्वरदत्त – ईश्वर द्वारा दत्त

तुलसीकृत – तुलसी द्वारा कृत

रसभरा – रस से भरा

मुँहमाँगा – मुँह से माँगा गया

चतुर्थी तत्पुरुष समास (सम्प्रदान तत्पुरुष- के लिए)

शिवार्पण – शिव के लिए अर्पण

रसोईघर – रसोई के लिए घर

यज्ञाहुति – यज्ञ के लिए आहुति

सभाभवन – सभा के लिए भवन

स्वागतगान – स्वागत के लिए गान

शरणागत – शरण के लिए आगत

ब्राह्मणदक्षिणा –  ब्राह्मण के लिए दक्षिणा

पञ्चमी तत्पुरुष समास (अपादान तत्पुरुष- से)

देशनिर्वासित – देश से निकाला गया

पदच्युत – पद से अलग

जन्मान्ध – जन्म से अन्धा

पथभ्रष्ट – पथ से भ्रष्ट

धनहीन – धन से हीन

षष्ठी तत्पुरुष समास (सम्बन्ध तत्पुरुष- का, की, के)

राजमहल – राजा का महल

राजपुत्र – राजा का पुत्र

राजकन्या – राजा की कन्या

गंगाजल – गंगा का जल

चन्द्रोदय – चन्द्रमा का उदय

अन्नदाता – अन्न का दाता

देशसुधार – देश का सुधार

ब्राह्मणपुत्र – ब्राह्मण का पुत्र

सुरवृन्द – सुरों का वृन्द

सप्तमी तत्पुरुष समास (अधिकरण तत्पुरुष- में, पै, पर)

पुरुषसिंह – पुरुषों में सिंह

निशाचर – निशा में भ्रमण करने वाला

पुरुषोत्तम – पुरुषों में उत्तम

कविश्रेष्ठ – कवियों में श्रेष्ठ

स्वर्गवासी – स्वर्ग में बसनेवाला

आपबीती – अपने पर बीती

घुड़सवार – घोड़े पर सवार

रथारूढ़ – रथ पर आरूढ़

जलमग्न – जल मे मग्न

कर्तव्यपरायणता कर्तव्य में परायणता

३- कर्मधारय समास – कर्मधारय समास में पूर्व और उत्तर-पद, दोनों प्रधान होते हैं। इसके पदों में विशेषण-विशेष्य, विशेषण-विशेषण तथा उपमान-उपमेय का सम्बन्ध होता है। कर्मधारय समास के दो भेद होते हैं :- (क) विशेषतावाचक (ख) उपमानवाचक।

(क) विशेषतावाचक – इसमेँ प्रथम पद द्वितीय पद की विशेषता बताता है।

महाकवि – महान् है जो कवि

नराधम –  अधम है जो नर

महौषधि  – महान् है जो औषधि

पीताम्बर – पीत अम्बर

पीतसागर –  पीत है जो सागर

नीलोत्पल  – नील है जो उत्पल

परमेश्वर परम है जो ईश्वर

नवयुवक – नया है जो युवक

अधमरा – आधा है जो मरा

(ख) उपमानवाचक-जब इस समास में एक शब्द उपमान और दूसरा उपमेय होता है तब भी कर्मधारय समास होता है।

चन्द्रमुख – चन्द्रमा के सदृश मुख

मृगनयन – मृग के सदृश नयन

चरणकमल – कमल के सदृश चरण

लौहपुरुष – लोहे के सदृश पुरुष

लतादेह – लता के सदृश देह

मृगलोचन – मृग के सदृश लोचन

४- द्विगु समास – जिस समास का प्रथम पद संख्यावाचक और अन्तिम पद संज्ञा हो, उसे ‘द्विगु समास’ कहते हैं।

चतुर्दिक – चारों दिशाएँ

दोपहर – दो पहरों का समाहार

त्रिफला – तीन फलों का समाहार त्रिलोक

त्रिलोक – तीनलोकों का समाहार

चतुर्युग – चार युगों का समाहार पंचपाल

त्रिकोण – तीन कोण

द्विगु में संख्यावाचक

नवग्रह, शतांश, षड्रस, चतुष्पद, चवन्नी, दुअन्नी आदि भी ‘द्विगु समास’ हैं।

५- द्वन्द्व समास – समस्त पद में इसमें दोनों पद प्रधान होते हैं और दोनों पद संज्ञा अथवा उसका समूह होता है। इसमें ‘और’, ‘वा’, अथवा आदि का लोप पाया जाता है।

सीताराम – सीता और राम

पाप-पुण्य – पाप और पुण्य, पाप या पुण्य

रात-दिन –  रात और दिन, रात या दिन

भाई-बहन – भाई और बहन, भाई या बहन

माता-पिता माता और पिता, माता या पिता

राधा-कृष्ण  – राधा और कृष्ण

पति-पत्नी  – पति और पत्नी

रुपया-पैसा  – रुपया और पैसा

६- बहुव्रीहि समास इस समास में भी दो पद रहते हैं। इसमें अन्य पद की प्रधानता रहती है अर्थात् इसका सामासिक अर्थ इनसे भिन्न होता है; जैसे- दशानन। इसमें दो पद हैं- दश + आनन। इसमें पहला ‘विशेषण’ और दूसरा ‘संज्ञा’ है। अत: इसे कर्मधारय समास होना चाहिए था लेकिन बहुव्रीहि में दशानन’ का विशेष अर्थ दशमुख धारण करनेवाले ‘रावण’ से लिया जाएगा।

लम्बोदर लम्बा है उदर जिसका अर्थात् गणेश

चक्र को धारण करता है जो अर्थात् विष्णु

खगेश – खगों का ईश है जो अर्थात् गरुड़

जल में उत्पन्न होता है जो अर्थात् कमल

पीताम्बर पीत है अम्बर जिसका अर्थात् श्रीकृष्ण

नीलकण्ठ नीला है कण्ठ जिसका अर्थात् शिवजी


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