स्वामी विवेकानंद पर निबंध – Essay on Swami Vivekananda in Hindi

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“उठो, जागो और तब तक ना रुको , जब तक लक्ष्य की प्राप्ति ना हो जाए”। स्वामी विवेकानंद जी के ऐसे कई विचार जो अभी भी लाखों-करोड़ों लोगों को प्रेरणा देते हैं ख़ासकर युवाओं को। स्वामी विवेकानंद जी की छवि एक तेजस्वी युवा साधु व ज्ञान के भंडार के रूप में थी । उनका पूरा जीवन मानव सेवा को समर्पित था। करोड़ों युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत के रूप में स्वामी विवेकानंद आज भी लोगों के दिल में मौजूद थे ।

जीवन परिचय – 12 जनवरी को युवाओं के प्रेरणा के रूप में हर साल स्वामी विवेकानंद जी का जन्मदिन 1984 से राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है|उन्हें संगीत सीखने ,घुड़सवारी , किताबें पढ़ना पसंद था। वे राजनेता, राजनीतिक आंदोलन के कार्यकर्ता नहीं  थे। स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी ,1863 को  कोलकाता में हुआ। धर्म और अध्यात्म के प्रति रुचि बचपन से ही रही। इनकी माता भुवनेश्वरी देवी प्यार से इन्हें विवरेश्वर  नाम से पुकारती थी। इस तरह उनके बचपन में घर का नाम वीरेश्वर रखा गया , किन्तु उनका औपचारिक नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था ।परिवार का माहौल भी धार्मिक और आध्यात्मिक ही था । श्री दुर्गाचरण दत्ता, (नरेंद्र के दादा) संस्कृत और फारसी के विद्वान थे । इनका परिवार कोलकाता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में से एक था ,वे नौ भाई बहनो मेँ एक थे | 25 वर्ष की आयु में साधु बन गए थे। स्वामी विवेकानंद जी ने 4 जुलाई 1902 , बेलूर मठ (हावड़ा ) में देह त्यागी ।

स्वामी जी की शिक्षा –  स्वामी विवेकानंद जी की प्रारंभिक शिक्षा कोलकाता के मेट्रोपॉलिटन संस्थान मेँ हुई और 18 साल की उम्र में उन्होंने कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में दाखिला लिया था और जीवन की विविधताओं को सीखने के लिए उन्होंने 14 साल की उम्र में ही छत्तीसगढ़ के रायपुर में 2 साल तक शिक्षा ग्रहण की। वे दर्शन, धर्म, इतिहास, सामाजिक विज्ञान, कला और साहित्य सहित विषयों में दिलचस्पी रखते थे। रामकृष्ण के प्रभाव से वे हिन्दू धर्म के केशव चंद्र सेन की नव विधान में शामिल हो गए। सन् 1884 में देवेंद्र नाथ टैगोर और केशव चंद्र सेन के नेतृत्व में अलग ब्रम्ह समाज की स्थापना की।

विश्व धर्म संसद – 11 सितंबर, 1893 में शिकागो कि विश्व धर्म संसद में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया और यह दिन इतिहास के पन्नों पर छप गया क्योंकि वहां पर उनके द्वारा दिए गए भाषण से पूरे विश्व में भारत का मान ओर ऊंचा हो गया । वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।

उनकी कर्म योग (1896) राज योग (1896) प्रमुख कृतियां हैं।

स्वामी जी के विचार -वे एक ऐसा समाज चाहते थे जहां सत्य हमेशा सामने रहे और वे पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में मानते थे । उनके विचार हमेशा युवाओं को प्रेरणा देने के रूप में  और आगे बढ़ने के विचार को प्रेरित करते थे ।उनका मानना था जब तक मानव की इच्छाशक्ति नहीं होगी तब तक समाज में सुधार नहीं किया जा सकता को समाज का सुधार बाहर से नहीं, अंदर से होना चाहिए और उसके लिए जरूरी है शिक्षा। स्वामी विवेकानन्द रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ के संस्थापक थे क्योंकि इनके गुरु का नाम रामकृष्ण था।

वे सार्वभौमिक धर्म (वैश्विक भाईचारे का सिद्धांत) को वैश्विक पटल पर रखना चाहते थे । उनका विचार था कि सत्य एक है । चाहे उसके रास्ते अलग-अलग क्यों ना हो। स्वामी विवेकानंद जी के जीवन को  जानना और उनके दर्शन और विचार को जानना  युवाओं के लिए अति आवश्यक है।स्वामी जी ने अपने धर्म में मानव समाज की सेवा को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। वे शिक्षा,स्त्री पुनरुद्धार तथा आर्थिक प्रगति के पक्ष में थे। रूढिवादिता,अंधविश्वास, निर्धनता और अशिक्षा की उन्होंने कटु आलोचना की।

 स्वामी जी के गुरु – गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी रामकृष्ण परमहंस से पहली भेंट 1881 में हुई थी। जिसके बाद उनके जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया और इस तरह रामकृष्ण परमहंस उनके गुरु बन गए । जिन्होंने आध्यात्मिक दर्शन और चिंतन के अनुशासन की शिक्षा दी।

स्वामी जी के प्रेरणास्त्रोत सामाजिक कार्य स्वामी विवेकानंद जी ने बराहनगर मठ की स्थापना भी की थी और वह भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में यात्रा करते थे।  रामायण ,महाभारत, संस्कृत व्याकरण के पाठ भी याद थे और एक सन्यासी के रूप में उन्होंने देश भर में पैदल यात्रा की। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे।

उन्होंने नवंबर 1894 में न्यूयॉर्क में वेदान्त समिति की स्थापना की और जनवरी 1895  न्यूयॉर्क में धार्मिक कक्षाओं का संचालन आरम्भ भी किया | 1 मई 1897, को बेल्लूर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की।

अद्भुत वेदांत दर्शन ‘अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा’ यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। भारत उनका परिवार, भारतवासी उनके भाई-बहन , वेदांत दर्शन उनका कर्तव्य , प्राचीन भारत दर्शन और सत्य को उजागर करना उनका धर्म था गरीबों की सेवा ईश्वर की पूजा के सामान था । वे ईश्वर को मानते हैं, सृष्टिवाद और विकासवाद , आत्मा जो पुनर्जन्म से  शुरू होकर पुनर्जन्म  की मुक्ति पर खत्म होती है| धर्म के बिना मानव जीवन असंभव है धर्म में आपसी मतभेद और टकराव यह भी जरूरी है। पर रचनात्मक समाज सुधार होना चाहिए। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके।

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