मंगल पांडेय | Essay on Mangal Pandey in Hindi

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मंगल पाण्डे का जन्म 19 जुलाई 1827  को फैजाबाद के ‘सुरहुरपुर’ नाम के गाँव में “भूमिहार ब्राह्मण” परिवार में हुआ था।  पिता का नाम दिवाकर पांडे था और माता अभिरानी पांडे । मंगल पाण्डेय  22 साल की कम उम्र में ही 1849 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की पैदल सेना में शामिल हो गए थे।वे बंगाल आर्मी के वे १९ और ३४ रेजीमेंट के सिपाही थे ।एक साधारण से  सिपाही थे ।बंदूक के कारतूस , सुवर और गाय की चर्बी से बनी होने की अफवाह से छावनी में मंगल पाण्डेय के नेतृत्व में बगावत  हो गई ।इसी कारण अंग्रेज़ो ने 6 अप्रैल 1857 को मंगल पाण्डेय का कोर्ट मार्शल दिया गया और 7 अप्रैल बैरकपुर में फ़ांसी दे दी गयी।

मंगल पाण्डे और कारतूस

नयी एनफ़ील्ड बंदूक से गोली दागने की आधुनिक प्रणाली (प्रिकशन कैप) का प्रयोग होने लगा था पर बंदूक में गोली भरने की प्रक्रिया पुरानी ही थी। नयी एनफ़ील्ड बंदूक में  कारतूस को दांतों से काट कर खोलना पड़ता था। उसमे भरे  बारुद को बंदूक की नली में भर कर कारतूस से डालना पड़ता था। कारतूस का बाहरी खोल में चर्बी होती थी जो पानी की सीलन से बचाती थी। सिपाहियों के बीच यह अफ़वाह फ़ैल गई थी कि कारतूस में लगी  चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनायी जाती है। दरअसल अंग्रेजों की सैनिक छावनी में राइफल के कारतूस की खोल पर सूअर और गाय की चर्बी लगा दी जाती थी । जब यह बात मंगल पांडेय और भारतीय सैनिकों को पता चली तो हिंदू और मुस्लिम धर्म के भावनाओं को काफी ठेस पहुंची ।

यही राइफल 1853 के राइफल के जखीरे का हिस्सा भी थी । मंगल पाण्डेय को स्कॉर्पियो का उपयोग करने पर जोर देने के एवज में मार्च 1857 में बैरकपुर की छावनी में मंगल पांडे ने अपने सार्जेंट मेजर पर गोली चला दी। फिर अंग्रेजों ने इस रेजीमेंट को भंग कर दिया था । 9 मई को मेरठ में मंगल पांडे की बात मानकर सैनिकों ने राइफल इस्तेमाल करने से भी इनकार कर दिया था । जो सैनिक नई राइफल का उपयोग करने से मना करते उन पर 9 साल जेल की सजा सुना दी जाती थी।  मंगल पांडे के नेतृत्व में  1857 में इसी क्रूर नीतियों के खिलाफ प्रथम स्वतंत्र संग्राम शुरू होने लगा था। मंगल पांडे ने 29 मार्च 1857 को अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह पहली चिंगारी सुलगाईं थी जो देखते ही देखते पूरे देश में भयंकर आग की तरह फैल गई थी। अपनी हिम्मत  और हौसले के दम पर अंग्रेजों को मत के सामने पहली चुनौती पेश करने वाले मंगल पांडे ही थे ।

क्रांति कि शुरुवात 1857 को  मंगल पांडे ने मेरठ से शुरू की गई। इस लड़ाई को आजादी की पहली लड़ाई माना जाता है कहा जाता है अंग्रेजों के भेदभाव नीतियों से परेशान होकर तंग आकर मेरठ छावनी ने भारतीय सिपाहियों ने खुला विद्रोह कर दिया था । ना सिर्फ अंग्रेज के हुकुम मानने से इनकार कर दिया था और जेलखाना को तोड़कर सैकड़ों बंदी भारतीय सैनिकों ने मुक्त करवाया था और क्रूर अधिकारियों की हत्या भी कर दी थी । मेरठ में विद्रोह की शुरुआत के बाद सभी भारतीय सिपाही दिल्ली की तरफ कूच कर गए।  11 मई 1857 को दिल्ली पर कब्जा करने का अभियान शुरू कर दिया गया और कंपनी के राजनीतिक एजेंट टेंपरेचर जैसे  समेत सैकड़ों अंग्रेजों की भी हत्या कर दी गई थी।  मंगल पाण्डेय की फांसी से गुस्साए सभी सैनिकों ने सरकारी दफ्तरों पर कब्जा कर लिया गया । उन्हें नष्ट कर दिया गया था।  सत्ता के केंद्र और प्रतीक दिल्ली पर भी उन्होंने कब्जा कर लिया था और दिल्ली का सम्राट बहादुरशाह को घोषित कर दिया गया था । उनके नाम पर सिक्के डाले गए और आदेश भी जारी होने लगे। भारतीय सैनिकों के और ब्रिटिश सैनिकों के बीच होने वाला भेदभाव और शोषण को लेकर भी पश्चिमी सभ्यता को लेकर समाज के बड़े वर्ग में भी आक्रोश था ।

 1857 की क्रांति में सहयोग

1857 के विद्रोह की पहली चिंगारी मंगल पांडे ने लगाई थी क्योंकि एनफील्ड बंदूकों में इस्तेमाल किए जाने वाले कारतूस ने अहम भूमिका निभाई और इन बंदूक में कारतूस भरने के लिए दांतो का इस्तेमाल होता था । सिपाहियों में यह खबर फैला दी गई थी कि कारतूस में लगी हुई चर्बी सूअर और कुत्ते और गाय के मांस से बनाई जाती है  जिससे सिपाहियों को लगा अंग्रेज उनका  धर्म भ्रष्ट करना चाहते हैं । ऐसे मुद्दे को आधार बनाते हुए बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे के नेतृत्व में अंग्रेजो के खिलाफ बिगुल बजा दिया गया।  छावनी के परेड ग्राउंड में मंगल पांडे ने दो अंग्रेज और अफसर पर हमला कर दिया । जिसके बाद 8 अप्रैल 1857 में अंग्रेजी हुकूमत ने मंगल पांडे को फांसी की सजा सुना दी । अंग्रेजों ने मंगल पांडे को 18 अप्रैल 1857 को फांसी दिए जाने की सजा सुनाई थी, लेकिन सरकार ने मंगल पांडे को पहले से तय तारीख से दस दिन पूर्व ही 8 अप्रैल सन् 1857 को फांसी दे दी।  स्थानीय जल्लादों ने मंगल पांडे को फांसी देने से मना कर दिया था । जिसकी वजह से कोलकाता से जल्लादों को बुलाकर देश के जांबाज सिपाही को फांसी दे दी गई थी।

स्वतंत्रता के इतिहास में इस लड़ाई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है।  इस लड़ाई में पूरे देश में अंग्रेजी हुकूमत के विद्रोह की बिगुल बजा दी थी ।  पूरे देश की जनता इस स्वतंत्रता संग्राम में शामिल थे। दरअसल ब्रिटिश शासन के अत्याचार और शोषण के खिलाफ मंगल पाण्डे एक भारतीय सिपाही के रूप में इस लड़ाई के जरिए ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी थी । जात पात और धर्म से ऊपर उठकर आजादी की पहली लड़ाई मंगल पांडे के साथ  समाज के हर वर्ग ने हिस्सा लिया था। आगे चलकर आजादी के इस लड़ाई में प्रथम स्वतंत्र संग्राम की काफी व्यापक असर पड़ा था। सदियों की औपनिवेशिक गुलामी भारत की जनता जब 1857 में मंगल पांडे के जोश को देखा  तो  इस लड़ाई में पूरा भारत शामिल हो गया क्योंकि मंगल पांडे के नेतृत्व में पहली बार गुलामी और विदेश नीतियों के खिलाफ इस लड़ाई में यह भी तय हो गया कि अंग्रेज अब  अपराजेय नहीं है उन्हें हराया भी जा सकता है।

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