मकर संक्रांति पर निबंध – Essay on Makar Sankranti in Hindi

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मकर संक्रांति भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है जो पूरे देश के साथ साथ पड़ोसी देश नेपाल और बांग्लादेश में भी 14 या 15 जनवरी को मनाया जाता है ।और कई बार 13 जनवरी को भी मनाया जाता है । ज्योतिष के अनुसार इस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है अर्थात सूर्य कर्क रेखा को छोड़कर मकर रेखा की तरफ जा आते हैं ।या फिर ऐसा कह सकते हैं कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की तरफ होते हैं इसलिए मकर संक्रांति को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं। मकर संक्रांति के त्योहार पर दान का बड़ा ही महत्व होता है और इस दिन तिल के लड्डू बनाकर एक दूसरे के बीच बांटा जाता है।

मकर संक्रांति पर किसानों की नई फसल तैयार होने लगती है ।जिसके कारण मकर संक्रांति को किसानों का त्यौहार भी कहा जाता है।

मकर संक्रांति का महत्व -मकर संक्रांति पर दान का बड़ा ही महत्व होता है इस दिन लोग तप, श्राद्ध और पूजा, आराधना करते हैं साथ ही कई चीजें दान करते हैं इस दिन तिल के लड्डू को भी बाटा जाता है । जिससे दान की श्रद्धा और बढ़ जाती है

मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व –

संक्रांति का अर्थ होता है संक्रमण यानी मकर संक्रांति से तात्पर्य संक्रमण को रोकना। ऐसा माना जाता है कि जाड़े के समय देवताओं की रात्रि होती है मतलब नकारात्मक । पर 22 दिसंबर के बाद जब सूर्य उत्तरायण की तरफ आता है तो सकारात्मक ऊर्जा साथ  लाता है और यह देवताओं का प्रतीक माना जाता है

मकर संक्रांति पर  लोग क्या करते हैं-

मकर संक्रांति पर लोग पतंग उड़ा कर उत्सव का आनंद लेते हैं ।साथ ही तिल के लड्डू बनाकर एक दूसरे को बांट कर खाते हैं। क्योंकि मकर संक्रांति से दिन बड़े होते हैं जिससे  लोगों के कार्य करने की शक्ति और चेतना बढ़ती है। और एक नई ऊर्जा का एहसास होता है।क्योंकि दिन बड़े होते हैं इसलिए कार्य करने का समय भी बढ़ जाता है।

देश के विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति का महत्व-

देश में मकर संक्रांति को अलग-अलग नामों से अलग-अलग राज्यों में जाना जाता है। जैसे – असम में माघ बिहू या भोगाली बिहू ,तमिलनाडु में पोंगल , उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में उत्तरायणी,बिहार में खिचड़ी, हरियाणा और पंजाब में लोहड़ी , कश्मीर में शिशुर सेक्रांत ,पश्चिम बंगाल में पोष संक्रांति के नाम से  मकर संक्रांति को जाना जाता है |

नेपाल और बांग्लादेश की मकर संक्रांति-

नेपाल के सभी राज्यो मैं मकर संक्रांति को अलग-अलग नामों से जाना जाता है पर मकर संक्रांति को नेपाल में खासतौर पर थारू समुदाय के लोग मनाते हैं। थारू समुदाय के लोगों के द्वारा इस त्यौहार को “माघी ” कहा जाता है।नेपाल में तीर्थ स्थान पर स्नान कर वहां पर पूजा करते हैं और यहां का त्रिवेणी मेला  काफी प्रसिद्ध मेला हैं ।

मकर संक्रान्ति का ऐतिहासिक महत्व-

मकर संक्रांति का एक ऐतिहासिक महत्व यह भी है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उसके घर जाते हैं क्योंकि शनि देव मकर राशि के स्वामी हैं। इसलिए भी इस त्यौहार को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है।माता यशोदा ने जब कृष्ण जन्म के लिए व्रत किया था तो उस समय सूर्य देवता उत्तरायण में प्रवेश कर रहे थे उसी  दिन  को मकर संक्रांति माना जाता है तब से ही  मकर संक्रांति का व्रत शुरू हुआ था

भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की और सभी असुरों के सिरों को मंदा पर्वत की नीचे दबा दिया था इसलिए इस दिन बुराइयों और नकारात्मक शक्ति का अंत भी माना जाता हैं। महाभारत में  भीष्म पिता ने अपने प्राण मकर संक्रांति के दिन  ही त्यागे थे।मकर संक्रांति के दिन ही गंगा नदी भागीरथी नदी के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में मिली थी

मकर संक्रांति का खगोलीय से  महत्व-

सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर 1 साल में पूरा करता है और जिससे हम परिभ्रमण कहते हैं

सर्दी के समय रात लंबी और दिन छोटे होते हैं जिसे अंधकार का दिन माना जाता है । पर मकर संक्रांति आते आते अंधकार में सूर्य का प्रकाश आने लगता है। क्योंकि मकर संक्रांति पर दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती हैं।

भारत देश उत्तरी गोलार्ध में स्थित है यानी भूमध्य रेखा से ऊपर।मकर संक्रांति पर्व से पहले सूर्य दक्षिणायन अर्थात सूर्य दक्षिण गोलार्ध में होता है मतलब भारत से सूर्य अधिक दूरी पर रहता है। जिसके कारण भारत में रातें बड़ी और दिन छोटे होते हैं । और सर्दी का मौसम होता है लेकिन मकर संक्रांति के आते-आते दिन बड़े होने लगते हैं और रात्रि छोटी होने लगती है गर्मी का मौसम शुरू होने लगता है।  यानी कि 22 दिसंबर से दिन बड़े होने लगते हैं।पुरानी कथा के अनुसार धरती पर लाने वाली गंगा को राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के का तर्पण किया था ।उनका तर्पण स्वीकार करने के बाद  इसी दिन गंगा समुद्र में जाकर मिल गई थी इसलिए मकर संक्रांति पर  प्रति वर्ष गंगा सागर पर मेला लगता हैं।

अधिकांश भारत में त्यौहार चंद्रमा की स्थिति को देखते हुए मनाया जाते हैं परंतु यह त्योहार सूर्य को देखकर मनाया जाता है इसलिए हिंदू पंचांग के अनुसार कोई तय तिथि जारी नहीं की जा सकती हैं सर्दियों के मौसम का अंत  भी माना जाता है |

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