Mahatma Gandhi

महात्मा गांधी |Essay on Mahatma Gandhi in Hindi

हिंदी, हिंदी निबंध

महात्मा गांधी एक महानायक, बेहद साधारण विचार पेश करने वाले जिनकी आवाज पर लाखों करोड़ों लोग एक ही स्थान पर जमा हो जाते थे। आइंस्टीन ने भी एक बार महात्मा गांधी के बारे में कहा था कि आने वाली पीढ़ियों को यकीन ही नहीं होगा कि एक हाड मास का एक ऐसा आदमी इस धरती पर चला भी था” भारत को स्वतंत्रता दिलाने में सबसे अग्रणी भूमिका निभाने वाले गांधीजी के विचार और उनके दूरगामी सोच ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी।

परिचय – मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म  गुजरात के तटीय शहर पोरबंदर में सन 1869 को हुआ था। सनातन हिंदू धर्म से ताल्लुक रखने वाले करमचंद गांधी, महात्मा गांधी जी के पिता थे ।  वे पोरबंदर रियासत के काठियावाड़ में दीवान थे। महात्मा गांधी जी की माता का नाम पुतलीबाई जो एक धार्मिक और घरेलू महिला थी। पुतलीबाई का गांधीजी के जीवन पर गहरा प्रभाव था । वे शाकाहारी , जीवन का सत्य और आत्म शुद्धि के नियम उन्होंने आजीवन पालन किए और सहिष्णुता जैसे कई विचार उन्हें अपने मां के विरासत से ही मिले थे। महात्मा गांधी का विवाह 14 साल उम्र की कस्तूरबा  जी से 1883 में हुआ था। पढ़ाई के लिए घर छोड़ते वक्त उन्होंने अपनी मां को वचन दिया कि वह शराब , मास और संकीर्ण विचारधारा से दूर रहेंगे। जिसका उन्होंने अपने पूरे जीवन में पालन किया था। बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद 1915 में गांधीजी वापस भारत लौटे।

शिक्षा -गांधीजी की आरंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई थी। फिर वे  सात वर्ष की उम्र में उनका परिवार काठियावाड की अन्य रियासत राजकोट में आकर बस गया था ।  यहाँ  उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूर्ण की। फिर बाद में हाईस्कूल में प्रवेश लिया । एकांत उन्हें बहुत प्रिय था।सन 1887 में गांधी जी ने ‘बंबई यूनिवर्सिटी’ की मैट्रिक की परीक्षा पास की और भावनगर स्थित ‘सामलदास कॉलेज’ में दाख़िला लिया। अचानक गुजराती से अंग्रेज़ी भाषा में जाने से उन्हें  कुछ दिक्कत होने लगी। गांधी जी डॉक्टर बनना चाहते थे। पर  राजघराने में उच्च पद प्राप्त करने की पारिवारिक परम्परा थी और वही गांधी जी को निभानी थी, तो उन्हें बैरिस्टर बनना पड़ेगा।इसलिए  1888 में इंग्लैंड के ‘सामलदास कॉलेज’ में दाखिला लिया था । पर उनके  मन में इंग्लैंड की छवि ‘दार्शनिकों और कवियों की भूमि, सम्पूर्ण सभ्यता के केन्द्र’ के रूप में थी।

 महात्मा गांधी और दक्षिण अफ़्रीका -(1893-1914)

 महात्मा गांधी  सिर्फ भारत देश ही नहीं बल्कि पूरा विश्व भी प्रभावित हुआ था। सत्य और अहिंसा की राजनीति को लेकर आज भी लोग उनके विचार को प्रासंगिक मानते हैं। और अपने सत्य और अहिंसा का पहला प्रयोग उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में ही किया था । महात्मा गांधी भारत से दक्षिण अफ्रीका 1893 में गए थे । वहां गांधीजी एक प्रवासी वकील थे ।पर उन्होंने कई कमजोर लोगों को दक्षिण अफ्रीका में उम्मीद की रोशनी जलाई। आवाज की ताकत का एहसास दिलाया । और इसी तरह का प्रयोग उन्होंने भारत को स्वतंत्र दिलवाने के लिए भी किया था । क्योंकि किसी भी  देश को स्वतंत्र करवाने में आम जनता का सबसे बड़ा  योगदान रहता हैं । आज भी गांधी जी की आवाज दक्षिण अफ्रीका में सुनी जाती है।

 जब वे मुंबई में वकालत शुरू करने लगे पर प्रैक्टिस ना जमने के कारण फिर वे राजकोट चले गए । यहां जरूरतमंदों की अर्जिया लिखने का काम शुरू किया । पर एक अंग्रेज अधिकारी के कारण यह काम भी बंद करना पड़ा। 1893 में दक्षिण अफ्रीका के एक फर्म ने महात्मा गांधी को जोड़ने के लिए न्योता दिया ।जिसके बाद वे नटाल चले गए। दक्षिण अफ्रीका में भी भेदभाव और अंग्रेज की दमनकारी नीति चल रही थी । जिसके कारण गांधीजी के मन और मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला।

 गांधी जी के जन नेता बनने का सफर दक्षिण अफ्रीका से ही शुरू हुआ था । क्योंकि यहीं से उन्होंने भारतीय समुदाय के लोगों से नागरिक अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष शुरू किया था । गांधी जी की जीवन में दक्षिण अफ्रीका में हुई घटनाएं उनकी जीवन में कई बदलाव लाई  क्योंकि यह घटनाएं सामाजिक अन्याय के खिलाफ जागरूकता का एक कारण बनी । गांधी जी भारत 1915 में आए और गांधी से महात्मा बनने का सफर की शुरुआत हुई।

महात्मा गांधी का भारत आगमन 1915 और इसके बाद –

जैसे छोटी छोटी नदियां मिलकर एक बड़ी नदियां में मिलती है वैसे ही महात्मा गांधी एक बड़ी नदी है जिसमें कई छोटे संगठन ने उनका  हर संभव साथ दिया । क्योंकि इसी मुख्यधारा ने भारतीय स्वतंत्रता लेने का तरीका ही  बदल दिया था।

 1905 के बाद से ही कांग्रेस में उग्र विचारधारा आने लगी थी जिसमें लाला लाजपत राय ,बाल गंगाधर तिलक, बिपिन चंद्र पाल जैसे नेता थे । 1915 के पहले कांग्रेस एक क्लब के जैसी थी जिसका संबंध  बड़े शहरों से था ना कि छोटे कस्बों या छोटे गांव या आम आदमी से । गांधी ने इस सीमित पहुंच को असीमित कर दिया था। और उन्होंने गांव गांव जाकर आंदोलन को देशव्यापी बना दिया। भारत पहुंचने के बाद उन्होंने पूरे भारत का दौरा किया और स्थानीय लोगों की मुसीबतों का हल  निकालना शुरू कर दिया था।

 अंगेजो से पहली बार 1917 चंपारण में  ,अंग्रेजों की तीन कठिया व्यवस्था को लेकर सामना हुआ था। अंग्रेज़ नील की खेती करा रहे थे।पर अंग्रेजों को गांधी के आगे झुकना पड़ा।  तो इस तरह चंपारण गांधी की प्रयोगशाला का भारत में पहला प्रयोग बन गया उसके बाद 1917 का खेड़ा गुजरात का खेड़ा आंदोलन माना जाता हैं ।  उसी साल अहमदाबाद के मिल मजदूरों ने आम लोगों के बीच गांधीजी को मसीहा बना दिया।  तो इस तरह गांधी जी को इतना प्रसिद्ध बना दिया । गांधी जी की एक झलक पाने के लिए लोग मिलो दूर चल कर आते थे।

1920 में असहयोग आंदोलन चलाया पर 1922 के चोरा चोरी कांड के कारण इस आंदोलन को स्थगित कर दिया गया। 1932 में गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए गांधीजी लंदन भी गए थे। 1932 में जेल से आने के बाद उन्होंने जन आंदोलन शुरू कर दिया था जैसे खादी आंदोलन ,अस्पृश्यता और संप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने पर जोर दिया।  1928 में बारदोली सत्याग्रह में सरदार वल्लभभाई पटेल की मदद करने से लेकर 1930 में दांडी मार्च सहित सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत की और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता की मांग रखी गई थी। जिससे पूरे देश में विशाल जन आंदोलन की शुरुआत हुई हो गया।

1930 से 1932 के बीच गांधीजी लंदन गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने चले गए और आजादी के पक्ष में मजबूत तर्क  रखें । फिर भारत आकर गांधी ने गांव गांव जाकर आंदोलन जारी रखा । 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन गांधी जी ने शुरूआत किया । इस तरह गांधी जी ने इस आंदोलन को पूरे भारत का जन आंदोलन में परिवर्तित किया तब्दील कर दिया । उन्होंने छोटे छोटे शहर और गांव में आंदोलन पर ध्यान दिया केंद्रित किया ।

महात्मा गांधी के विचार –

गांधीजी के विचार सत्य और अहिंसा के साथ-साथ ग्राम उद्योग और स्वच्छता पर भी थे। क्योंकि वे  कहते थे कि देश की आधी से ज्यादा जनसंख्या गाँवों में निवास करती है । जब तक गांव का विकास नहीं होगा देश का विकास नहीं हो सकता । गांधीजी का मानना था। कि बड़े उद्योग मजदूरों और किसानों की मेहनत को ना लूट सके । इसके लिए उन्होंने कुटीर उद्योग पर जोड़ दिया था | गाँधी ने कहा कि अपनी जरूरत का सामान,  गांव के लोग खुद आत्मनिर्भर बनकर बनाए ।

 आजादी की लडाई में जब उन्होंने विदेशी कपड़ों का बहिष्कार किया और खादी अपनाने की बात कही तो उस समय ही गांधी जी ने गांव को आत्मनिर्भर बनाने की पूरी योजना बता दी थी । और गांधीजी का मानना था कि जीवन में जरूरत न्यूनतम होनी चाहिए । जरूरतों के हिसाब से ही गांव आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर होना चाहिए ।हर एक गांव को आर्थिक तौर पर सम्मान का दर्जा होना चाहिए।  जो अपनी जरूरतों को उजागर करने में सक्षम होगा। ग्राम उद्योग के साथ वे पर्यावरण के लिए भी बहुत चिंतित थे।  उनका मानना था  खेती के लिए जो भी छोटे उद्योग होंगे उनसे प्रदूषण कम होगा और गांव साफ सुथरा रहेगा । स्वच्छता के गांधी जी के विचार से कई लोग हैरानी में पड़ जाते थे । दक्षिण अफ्रीका में भी गांधी जी ने वहां के लोगों को  स्वच्छता के लिए कई आदतें डाली और उनका मानना था कि जीवन में स्वतंत्रता के बाद स्वच्छता का दूसरा स्थान है।

 उस समय प्लेग की  महामारी में स्वच्छता बेहद जरूरी थी । गांधी ने स्वच्छता के मुद्दे को लेकर भारतीयों के लिए बस्ती की निगरानी के लिए निवेदन किया और निगरानी के बाद नगर पालिका को पत्र भी लिखें । सफाई के प्रति लापरवाही को उन्होंने नगरपालिका प्राधिकरण को भी पत्र  दिया।  1913 में स्वच्छता के बारे में उन्होंने एक “स्वछता के सामान्य ज्ञान”  नामक बुकलेट भी लिखी थी।

गांधी ने कहा कि वह एक सनातनी हिंदू है जो सत्य और अहिंसा बुनियादी उसूलों पर विश्वास करता है। और उनके आराधना भी करते हैं क्योंकि मैं सच्चा हिंदू हूं  , तो उतना ही सच्चा मुसलमान भी हूं और सच्चा क्रिश्चियन भी। पर वे हमेशा जाति व्यवस्था का विरोध करते आए हैं । उनका मानना था कि गोरक्षा जितनी जरूरी है उतना मनुष्य भी । क्योंकि जैसे गाय उपयोगी है वैसे मनुष्य भी । चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान। उन्होंने धर्मों की दीवारें तोड़ दी थी । वे धर्मों के नाम पर हिंसा का विरोध हमेशा करते थे।

वे आत्म  संयम पर बल देते थे । आध्यात्मिक स्वरूप पर जोर दिया। उन्होंने कहा था एक बार कि व रामराज लाना चाहते हैं।  पर ये रामराज एक आदर्श राज्य की कल्पना से है। जिसमें सबको समानता ,किसी को किसी का डर नहीं, सभी आत्मनिर्भर और किसी भी नागरिक को कोई कष्ट नहीं।

गांधीजी का मानना था। अगर छोटे-छोटे गांव को शासन का अधिकार मिल जाए तो स्थानीय जरूरतों के हिसाब से वह आगे बढ़ सकते हैं । गांधी का ग्राम स्वराज का मतलब आत्म निर्भर या फ़िर हर गांव अपने पड़ोसी गांव से अपनी जरूरतों की इच्छा के मुताबिक पूरी तरह स्वाधीन होगा।  जिससे भोजन,  कपड़ा,  साफ पानी , स्वच्छता , स्वतंत्र आवाज,  शिक्षा जैसी बुनियादी मुद्दों पर बेहतर काम हो पाएगा । मनुष्य जानता है कि उसके लिए उपयोगी कौन सी चीज है और वह अपनी बुनियादी  चीजों का उत्पादन कर सकता हैं।

 वे प्रकृति या कमजोर पर अत्याचार  करके विकास के तर्क में नहीं थे।  चुकी गांधी जी का मानना था कि पूरे देश को एक चश्मे से नहीं देखा जा सकता । हर गांव की अलग-अलग जरूरत हो सकती है गांधी का ग्राम स्वराज का मतलब सरकारी नियंत्रण से मुक्त।  चाहे वह विदेशी सरकार हो या राष्ट्रीय सरकार के नियंत्रण । हर चीज से मुक्त होनी चाहिए । ग्राम स्वराज में किसी भी तरह का भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। पूर्ण स्वराज पहुंचने के बाद लोगों के बीच कोई मतभेद नहीं होना चाहिए । हिंदू और मुसलमान एक समान होने चाहिए । गांधी का विचार था कि   सामाजिक,  शैक्षणिक ,आर्थिक आधार पर पीछे छूट चुकी आबादी को तवज्जो दी जानी चाहिएं।

महात्मा गांधी की हत्या – 30 जनवरी 1948 को सुबह बिरला हाउस से गांधी जी को उस वक्त 3 गोली मार दी गई । जब वह पूजा करने के लिए जा रहे थे। जिससे पूरा देश स्तब्ध रह गया था नाथूराम गोडसे ने तीन गोली चला कर पूरे देश को एक महानायक का नेतृत्व करने वाले लीडर को भारत के लोगों से दूर कर दिया था।

महात्मा गांधी और भारत –गांधी जी कई रूप हैं। जिसमें से  कुशल राजनेता , महान विचारक,  समाजसेवी ,आध्यात्मिक संत ,पत्रकार , लेखक और एक सितारे के जैसे छवि रातों-रात चमत्कार करने वाले एक अविष्कारक पुरुष के रूप में हुई । इनके व्यक्तित्व ने ना सिर्फ पूरे भारतवर्ष को एकजुट किया । बल्कि आजादी के लिए हर संभव प्रयास करने के जुनून को भी जगाया क्योंकि आंदोलन में हमेशा दो बुनियादी समस्याएं रही थी ।एक नेतृत्व दूसरा संगठन ।1915 तक भारत के सभी आंदोलन  बिखराव स्थिति में थे । जिनकी दिशा और नेतृत्व गांधी जी ने ही आंदोलन को दिया।  गांधी जी के आने  कारण अब आंदोलन ज्यादा संगठित होने लगा था।

गांधी जी के द्वारा लिखी गई पुस्तकें –  हिंद स्वराज,  my एक्सपेरिमेंट with truth , Satyagraha in South Africa ,आदि।

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