समाचार पत्र और उनकी उपयोगिता | Essay on Importance of Newspapers in Hindi

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समाचार पत्र का स्थान आज प्रत्येक परिवार के लिये धार्मिक ग्रन्थ की तरह हो गया है। इसका कारण यह है कि समाचार पत्र किसी राष्ट्र  के उदबोधन का प्रमुख साधन है । यह वह साधन है जिससे राष्ट्र की विश्रृंखल कड़ियाँ जुड़ती है और राष्ट्र अज्ञानता के तिमिर को लांघकर राष्ट्रीय चेतना का प्रकाश देखता है। इसी साधन के द्वारा नागरिकों में भ्रातृत्व, कर्तव्यपरायणता, त्याग और देश भक्ति के बीज बोये जाते है । समाचार पत्र ही किसी देश के सार्वजनिक सुधार का प्रतिनिधि होता है । समाचार पत्र आज के युग मे राष्ट्र वाणी होता है जिसे सुनकर मानव समाज कर्त्तव्य निर्धारित करता है।

समाचार पत्रों का प्रारम्भ

मनुष्य के एकांतिक विचारों को सर्वव्यापी बनाने वाले समाचार पत्र का श्री गणेश 16 वीं शताब्दी में इटली के वेनिश नगर  में हुआ था हमारे देश में इसका प्रचलन सन 1780 में हुआ था ।अंग्रेजो ने “इंडिया गजट” नामक समाचारपत्र निकाला था और पादरियों ने ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए “समाचार दर्पण” नामक समाचार पत्र निकाला था। तब से अब तक सैकड़ों समाचार पत्र निकलने लगे । इन समाचार पत्रों ने अंग्रेजी शासन में राष्ट्रीय चेतना की जागृति  में बड़ा योगदान दिया । भारतेन्दु हरिशचन्द्र की “हरिश्चन्द्र चन्द्रिका” से लेकर गणेश शंकर जी के “प्रताप” और कृष्णदत्त पालीवाल के “सैनिक” तक हिन्दी समाचार पत्रों की एक बाढ़ सी आ गयी ।साथ ही साथ अन्य भाषाओं में भी अनेकानेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए जिनसे राष्ट्रोत्थान में  मदद मिली।

समाचार पत्रों के प्रकार

समाचार पत्रों के अनेक स्वरूप और प्रकार होते हैं । समय की दृष्टि से दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्र होते हैं । दैनिक और साप्ताहिक पत्र प्रायः समाचारों से सम्बन्धित होते हैं । पाक्षिक और मासिक पत्रिकायें होती हैं । पत्रिकाये त्रैमासिक भी होती है और कुछ ऐसे भी पत्र होते हैं जो षट्मासिक और वार्षिक होते हैं। लेकिन ऐसे पत्र (जर्नल) प्राय किसी विषय की वार्षिक रिपोर्ट होते हैं । त्रैमासिक और मासिक पत्रिकायें होती है और इनमें कविता, कहानी, निबन्ध, आलोचना एवं अन्य विषयों पर ज्ञान-वर्धन की सामग्री प्रस्तुत रहती है ।

भाषा की दृष्टि से तो उतनी ही पत्र-पत्रिकाये होती है जितनी भाषायें किसी देश में होती है । विषय की दृष्टि से पत्रिकायें साहित्यिक, धार्मिक, व्यापारिक ,वैज्ञानिक, राष्ट्रवादी, चित्रपट सम्बन्धी एवं विभिन्न राजनीतिक मतो (यथा प्रजातन्त्र, साम्यवाद, उदारवाद) से सम्बन्धित होती हैं । कुछ पत्रिकाये विशेष रूप से बालकोपयोगी या स्त्रियोपयोगी ही होती हैं । हमारे देश में धार्मिक पत्रिकाओं में ‘कल्याण’, सिनेमा से सम्बन्धित फिल्म फेयर’ व ‘फिल्म इंडिया व्यापार से सम्बन्धित ‘कामर्स’ और ‘कैपिटल’ तथा साहित्यिक और विविध रुचियों को सन्तुष्ट करने वाली इंडिया-टुडे’. ‘धर्मयुग’ और ‘हिन्दुस्तान’ पत्रिकायें बहुत प्रसिद्ध है । भारत भर में विख्यात अनेक दैनिक पत्र भी हैं।

उपयोगिता

समाचार पत्रों से अनेक लाभ हैं । सबसे मुख्य लाभ यह है कि ये किसी भी राष्ट्र की भावात्मक एकता के लिए एक महान साधन है । भारत जैसे महान देश में यदि समाचार पत्र न होते तो विभिन्न प्रान्तों में वैचारिक एकता स्थापित न हो सकती थी। इसी प्रकार विश्वव्यापी वैचारिक एकता स्थापित होनी असम्भव थी हम समाचार पत्रों से नित्य विश्व के कोने कोने की घटनायें पढ़ते है और अपने यूरोपवासी बन्धुओं के सुख और दुख के साथ भावनात्मक एकता स्थापित करते हैं ।

विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, सभ्यताओं, परम्पराओं, प्रथाओ आदि के विषय में ज्ञान का आदान प्रदान और ज्ञान वृद्धि का साधन समाचार-पत्र है। समाचार पत्रों की टिप्पणियों और संपादकीय लेख हमारे विचारों को न केवल पैना करते हैं वरन् समस्याओं को समझने में मदद देते हैं। इस प्रकार विचार-विकास की दिशा में समाचार पत्र अत्यन्त उपयोगी है।

समाचार-पत्र राष्ट्र के सामूहिक निर्माण में मदद करते हैं । अंग्रेजी शासन काल में भारत को सामाजिक, राजनीतिक एवं आध्यात्मिक चेतना प्रदान करने में समाचार-पत्रों ने बड़ी मदद की । समाचार पत्रों से नारी समस्या, हरिजन समस्या, आर्थिक शोषण, धार्मिक अत्याचार, राष्ट्र विरोधी प्रचार हिन्दू-मुस्लिम समस्या और अंग्रेजों की कुटिल नीति के विषय में भारत को चेतना प्राप्त हुई ।

इसी प्रकारआज भी हमारा राष्ट्र किधर जा रहा है. इसके विषय में स्पष्ट चित्र समाचार पत्रों से मिलता है । इनसे ही हमें  विधायक और विध्वंसक विचारों को समझने में मदद मिलती है। समाचार-पत्र का कार्य सिनेमा और रेडियो भी करते हैं परन्तु इनके कार्य गरीब की झोपड़ी तक नहीं पहुँच पाते हैं । ये साधन खर्चीले हैं । लेकिन समाचार पत्र कम कीगत में सर्व-सुलभ है । इसीलिए समाचार पत्र बहु-प्रचलित साधन हैं।

व्यापारिक प्रचार के लिये समाचार पत्र प्रबलतम साधन है| पत्र-पत्रिकायें अनेक प्रकार के विज्ञापनों को छाप कर बड़े-बड़े उद्योगों, वस्तुओं के ठिकानों व उनकी उपयोगिताओं की जानकारी हमें कराते हैं | वस्तुओं के भाव उनकी माँग और अधिक मात्रा में मिलने के स्थानों का ज्ञान उन्हीं से प्राप्त कर व्यापारी और उपभोक्ता दोनों लाभ उठाते हैं । इसके अतिरिक्त आज के जीवन में रोजगार या नौकरी पाने के लिए “आवश्यकता है” के स्तम्भों को पढ़कर शिक्षित जगत नौकरियाँ पाता है !

आयोगों द्वारा विज्ञापित बड़े-बड़े पद समाचार पत्रों के अभाव में हमें कैसे मिल सकते थे । इतना ही नहीं. ये समाचार-पत्र स्वयं में एकव्यवसाय हैं । समाचार पत्रों के मालिक लाखों रुपया कमाते हैं और लाखों श्रमजीवी इन्हीं पर पलते हैं। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं, समाचार पत्र प्रान्तीयता जैसी संकीर्ण भावनाओं को नष्ट करते हैं । आज हम कश्मीरी और मद्रासी के विषय में पहले से अधिक जानते हैं और संवेदनात्मक एकता स्थापित करते हैं । बन्धुत्व भावना को फैलाने में ये समाचार पत्र हमारे अचेतन रूप से सहायक हैं।

आज जब हम प्रजातन्त्र समाज स्थापित करने के लिए कटिबद्ध है ये पत्र अत्यन्त उपयोगी हैं। इनके द्वारा ही हम सरकार के अप्रजातान्त्रिक कार्यों की निन्दा करके उसे उसके इरादे से विरत करते हैं और अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाते हैं । सरकार भी समाचार पत्रों के माध्यम से अपने कार्यों व अपनी योजनाओं का अनुमोदन जनता से प्राप्त करती है । इस प्रकार सरकार और जनता के बीच सम्पर्क स्थापित करने के लिए समाचार पत्र एक पुल का कार्य करते हैं और प्रजातन्त्र के आदर्श और व्यवहार को सतत सुरक्षित रखते हैं । चुनाव के समय ये पत्र ही समस्त सूचनाये देते हैं जिनके कारण बड़े से बड़े देश में चुनाव सम्पन्न होता है।

समाचार-पत्र मनोरजन का भी साधन है । इसमें प्रकाशित कहानियाँ, व्यंग्यचित्र, व्यंग्यकथानक आदि तथ्यात्मक होते हुए भी एक बौद्धिक आनन्द और संवेगात्मक गुदगुदी पैदा करते हैं ।कहने का आशय यह है कि वर्तमान सभ्यता के लिये समाचार-पत्र एक रीढ़ की तरह है ऐसा प्रतीत होता है कि इनके बिनाmanushaya कई शताब्दियों पहले का सीमित ज्ञान वाला मनुष्य बन सकता है।

हानियाँ

समाचार-पत्रों से कुछ हानियों भी है । कभी-कभी अल्पज्ञ पत्रकार सनसनीखेज घटनाओ को बढ़ा चढ़ा कर प्रकाशित कर अन्य स्थानों की धार्मिक और साम्प्रदायिक शान्ति भंग कर देते हैं । एक छोटी सी घटना बड़ी विध्वसंक सिद्ध होती है । कुछ समाचार पत्र विचार विशेष के प्रधारक होते हैं, अतःउन्हें पढ़ने से मानव का विचार एकांगी बन जाता है । बड़े-बडे समाचार-पत्र प्रायः धनियों के होते हैं अतः वे किसी भी घटना को एक निश्चित दृष्टिकोण से प्रकाशित करते हैं परिणाम स्वरूप प्रायः जनमत को स्वतन्त्र चिन्तन करने में कठिनाई होती है। इसप्रकार बड़ा जन समुदाय समाचार-पत्रों में प्रकाशित सम्पादकीय लेखों के विचारों का दास बना रहता है और धनी वर्ग को वैचारिक शासन करने का बहुत अवसर प्राप्त रहता है।

हमारे लिये यह आवश्यक है कि पत्रकार निष्पक्ष विद्वान हो तो समाचार पत्र वैज्ञानिक युग के लिये एक वरदान है और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के आदर्श को प्राप्त कराने का सुगम साधन है ।

Disclaimer : This article is accurate and true to the best of the author’s knowledge. Content is for informational or education purposes only and does not substitute for personal counsel or professional advice in business, financial, legal, or technical matters

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