जीवन में परिश्रम का महत्त्व | Essay on Importance of Hardwork in Life in Hindi

हिंदी, हिंदी निबंध

“सकल पदारथ है जग माही । कर्महीन नर पावत नाहीं |”

यह जगत परमात्मा का कार्य-शरीर है । परमात्मा कारण रूप से शान्त है लेकिन कार्य रूप में गतिशील है । हम कर्ममय जगत में रह रहे हैं । अत; इस जगत में कर्म करना स्वाभाविक कर्तव्य है | कर्म परिश्रम का ही दूसरा नाम है । अत: बिना परिश्रम या उद्योग के सफलता देवी को सिद्ध नहीं किया जा सकता है । परिश्रम किसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिये तन, मन व धन के द्वारा किये गये प्रयत्न की प्रक्रिया का नाम है ।

मानसिक स्तर पर परिश्रम किसी लक्ष्य पर सम्पूर्ण रूप से ध्यान केन्द्रित करने का नाम है |अतःस्पष्ट है कि बिना केन्द्रित मन के परिश्रम में वह तीव्रता नहीं आ सकती है जो फलसिद्धि के लिये आवश्यक है। फिर भी यदि कहीं परिश्रम है| तो निश्चय वहाँ उस व्यक्ति का ध्यान केन्द्रित अवश्य होगा। परिश्रम को मानव-पुरुषार्थ भी कहा जाता है । विना पुरुषार्थ के मनुष्य महान नहीं हो सकता है। इतिहास में महान पुरुषों के जीवन इस तथ्य के ज्वलन्त उदाहरण हैं । योगवाशिष्ठ में इसी पुरुषार्थ श्रम या कर्म की महिमा बडी स्पष्टता के साथ बताई गई है । उसमें लिखा है-

सुरत्वं च मुनित्वं च राजेन्द्रत्वं लभेन्नरः । कर्मणा च शिवत्वं च गणेशत्वं तथैव च ।।

कर्मणा च मुनीन्द्रत्वं तपस्वित्वं स्वकर्मणा ।स्वकर्मणा क्षत्रियत्वं वैश्यत्वं च स्वकर्मणा ॥

अर्थात् कर्म से साधारण मानव को सुर, मुनि, राजा तपस्वी, गणेश और शिव का पद प्राप्त हुआ करता है । योग वाशिष्ठ में यहाँ तक निर्देश है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश आदि का महान पद प्राप्त करने के लिये कर्म ही एकमात्र साधन है । यह सत्य है कि कर्म के द्वारा ही मनुष्य अपनी प्रारम्भिक आवश्यकताओं- भोजन,वस्त्र और आवास आदि को प्राप्त करता है । यह कर्म या परिश्रम ही साधारण मनुष्य को महान पद पर बैठा देता है ।मानव श्रम के कारण ही आज समस्त प्राणि- वर्ग में सर्वश्रेष्ठ है । वह समस्त प्रकृति पर शासन करता है ।

परिश्रम में अनेक गुण हैं । यह मनुष्य को निष्ठावान आत्मविश्वासी व एकाग्रचित्त बनाता है । उसमें धैर्य और साहस के गुण भर कर उसे आशावान बनाता है । जिस प्रकार किसी इष्ट-देवता की पूजा करने से उसी इष्ट देव के गुण उपासक में आ जाते हैं, उसी प्रकार कर्म या परिश्रम में संलग्न व्यक्ति में अनेक गुण विकसित होते हैं । इसीलिये विद्वानों ने ‘श्रम ही पूजा है” (Work is worship) कहा है । परिश्रम विहीन पुरुषअकर्मण्य बन कर ससार के उन सुखों से वंचित रहता है| जो केवल परिश्रम-साध्य होते हैं और वह भाग्य या ईश्वर को कोसता है ।

यह निश्चित है कि ईश्वर उन्ही की मदद करते हैं| जो अपनी मदद स्वयं करते हैं ।(God helps those who help themselves) रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने स्पष्ट कहा है कि-

“कादर मन कहुँ एक अधारा ।दैव दैव आलसी पुकारा ||”

यह प्रसंग उस समय का है जब भगवान राम सागर से लंका में प्रवेश करने के लिए रास्ता माँगते है| और जड़ जलधि कुछ उत्तर नहीं देता है । तब लक्ष्मण उपर्युक्त सिद्धान्त राम के प्रति कहते हैं । यह सच है कि परिश्रम ही भाग्य का निर्माता है। भाग्य वही है जो हमने पूर्व परिश्रम किया है । भाग्य और परिश्रम एक ही वस्तु के दो नाम हैं । परिश्रम प्रक्रिया है, भाग्य उसका फल है । परिश्रम बीज बोना है | और भाग्य मानो फसल काटता है|बिना परिश्रम के भाग्य की प्रतीक्षा करना मूर्खता है | हमें यह मालूम नहीं है| कि हमने पहले क्या परिश्रम किया है ।अतः हमारे हाथ में परिश्रम करते रहना ही है । फल या भाग्य कहीं जाने को नहीं है ।

इसीलिये यह कहा जाता है कि भाग्य एक सुस्त देवी है| वह पास नहीं आती है, उसके पास जाना होता है ।

( (Fortune is a lazy Goddess. She never comes to you, you have to go to her.)

यह भी सत्य है कि यद्यपि हमें अपने कर्मों का फल मिलता है । लेकिन मनुष्य वह अदम्य शक्ति है जो परिश्रम से भाग्य को बदल देता है । वर्तमान कर्म और भूतकालीन कर्मफल में संघर्ष होता है |और वर्तमान महान कर्म भूतकालीन भाग्य को उलट देता है ।यद्यपि कर्माधीन सृष्टि घटना घटती है ।तो भी बंधन रज्जु उचित कृत से कटती है । इसीलिये कवि ने स्फूर्ति दायक शब्द लिखे है कि पुरुष हो पुरुषार्थ करो उठो । यही कवि कहता है –

पुरुषार्थ विना क्रियता नहीं, पुरुषार्थ विना प्रियता नहीं ।

समझ लो यह वात यथार्थ है, कि पुरुषार्थ वही पुरुषार्थ है।

पुरुषार्थ या परिश्रम से ही आदर प्राप्त होता है। यही यश का स्रोत है । परिश्रगी व्यक्ति समाज और राष्ट्र द्वारा सम्मानित होते हैं। इन्ही व्यक्तियों के चले जाने से संसार में रिक्तता आ जाती है और इसीलिये ये यश प्राप्त करते हैं । इतिहास में विद्या, धन, काव्य, राजनीति, अध्यात्म आदि सभी क्षेत्रों में परिश्रम से ही व्यक्ति महान पुरुष बने हैं ।

नेपोलियन जिसे कार्लाहल एक दैवी विभूति मानता था, गरीब घर का बालक था। परिश्रम से वह एक महान पराक्रमी पुरुष हुआ । कालिदास निरक्षर थे । परिश्रम से वे महान कवि बने । हमारे दिवंगत नेता लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री अपने परिश्रम से बने । ईश्वर चन्द्र विद्यासागर परिश्रम के कारण ही शिक्षाविद् बने । अब्राहम लिंकन के पिता लकडहारे थे| लेकिन पुत्र अमेरिका का राष्ट्रपति बना । महामानव गांधी परिश्रम के कारण ही महान बने । परिश्रम ने न जाने कितने गुदड़ी में छिपे लालों को उजागर किया । इसी प्रकार अनेक व्यक्ति परिश्रम के कारण ही धनी और महान बनते देखे जाते हैं ।

परिश्रमी के लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है ।उसके लिए विश्व के सुख हस्तामलकवत् होते हैं ।

परिश्रम प्रारम्भ में विष के सदृश लगता है लेकिन फल में अमृत के सदृश होता है | फिर अभ्यास से सब सुगम होता है । महामूर्ख अभ्यास और ध्येय की एकाग्रता से विद्वान बनते हैं । कहा गया है कि-

“करत-करतअभ्यास के जड़मति होत सुजान । रसरी आवत जात ते सिल पर होत निशान ।।”

परिश्रम और धैर्य साथ-साथ चलते हैं ।परिश्रमी व्यक्ति दिन रात एक कर देते हैं। उनके लिये लक्ष्य सिद्धि के अतिरिक्त और कुछ प्रत्यक्ष नहीं होता है । जब सारा संसार सुख की नींद सोता है| तब परिश्रमी व्यक्ति जागता है। उसकी यह तपस्या कल्पवृक्ष बनकर उसका ध्येय सिद्धि करती है । अंग्रेज कवि ने लिखा

“Heights by great men reached and kept, Were not attained by sudden flight, But they while their companion slept, Were toiling upward in the night.”

इस प्रकार परिश्रम की महिमा को जानकर भी मनुष्य दुख भोगें तो किसी का क्या वश है ? बहुत से लोग संतो के कथन का मर्म न समझ कर अकर्मण्यता का ही वरण करते हैं । जैसे दासी हतबुद्धि मंथरा की निम्न बात को सिद्धान्त वाक्य मानना मूर्खता की प्रथम निशानी है-

“कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाँड़ि अव होव कि रानी ।।”

इसी प्रकार,

“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम । दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।।”

इन वाक्यों का अर्थ ठीक न समझ कर लोग अकर्मण्यता की शरण में चले जाते हैं । उपर्युक्त दोहे के द्वारा संत ने भगवान के पोषक स्वरूप का वर्णन किया है। लेकिन भगवान पर जिन्हें विश्वास नहीं है और जो कर्म करना न चाहे वे तो दरिद्र बनकर मरेंगे ही । वैसे कर्म के बिना संसार टिक नहीं सकता है । पक्षी कर्म करते हैं, अजगर भी मिट्टी खाता है । यहाँ यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर अजगर परिश्रम नहीं करता तो मिट्टी ही खाता । जिसे सुख-भोग की इच्छा नहीं है, वह जितने में चाहे प्रसन्न हो ले । संत भी तो भगवान को पाने के लिए परिश्रम करता है । इसलिए तर्कसंगत निष्कर्ष यही है कि जिसे संसार में रहकर कुछ बनना है, कुछ प्राप्त करना है, उसे परिश्रम करना ही पड़ेगा ।

परिश्रम न करने के कारण आज बहुत से लोग दिशाहीन होकर घूमते रहते हैं । परिश्रम न करने वाला विद्यार्थी ज्ञान के अभाव में हताश जीवन व्यतीत करता है । लेकिन संसार में वही लोग आगे बढ़ जाते हैं जो परिश्रम के साथ लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अग्रसर होते रहते हैं । विना परिश्रम किये अत्यन्त बलवान शेर के मुँह में मृग यों ही प्रविष्ट नहीं होते हैं । संसार में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है |जो यह सिद्ध कर सके कि परिश्रम के अभाव में कोई उन्नति कर सका हो।

आलस्य से मन, बुद्धि, शरीर और कार्य का विनाश हो जाता है । अस्तु हमें परिश्रम के साथ जीवन बिताने की प्रतिज्ञा आज ही कर लेनी चाहिये।

Disclaimer : This article is accurate and true to the best of the author’s knowledge. Content is for informational or education purposes only and does not substitute for personal counsel or professional advice in business, financial, legal, or technical matters

Leave a Reply

*

code