भगत सिंह | Essay on Bhagat Singh in Hindi

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भगत सिंह को दुनिया  शहीद ए आजम भगत सिंह के नाम से भी जानते हैं | भगत सिंह का जन्म 19 सितंबर 1907 को गाँव बंगा, जिला लायलपुर, पंजाब में हुआ था। भगत सिंह का जन्म एक क्रांतिकारी परिवार में हुआ था क्योंकि इनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा सरदार अजीत सिंह भी देश की आजादी के लिए लड़ रहे थे। भगत सिंह के माता का नाम विद्यावती कौर था । भगत सिंह का परिवार एक किसान परिवार था।एक  दिन जब भगत सिंह  7 साल के थे तो  खेतों से पिस्तौल मिट्टी में डालने लगे। जब उनसे पूछा गया तो भगत सिंह का जवाब था कि वे खेतों में बहुत सारी बंदूकें उगाना चाहते हैं । जिससे एक दिन सभी इन बंदूकों का उपयोग कर ब्रिटिशर्स को भारत देश से निकाल फेंके। छोटी सी उम्र से ही भगत सिंह  का देश के प्रति गहन प्रेम था  और वे हर कीमत पर भारत को स्वतंत्र देखना चाहते थे ।

क्रांतिकारी भगत सिंह

 क्रांतिकारी भगत सिंह ने घर को कुर्बान किया और भारत की दुर्दशा  ने भगत सिंह को नास्तिक बना दिया था । उन्हें ना खुद के मां की फिक्र थी ना पिता का ख्याल दिल में बस  एक ही जज्बा जिंदगी का बसाया था कि पूरे भारत देश को अंग्रेजी गुलाम से स्वतंत्रता दिलाई जाए।

13 अप्रैल 1919 को जालियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह के मन में क्रांति की लपटें उठने लगी थी और इसी बीच देश में असहयोग आंदोलन की भी शुरुआत हो गई थी । भगत सिंह को लगा कि अब आंदोलन आजादी के लिए आम जनता के लिए तैयार हो गया है लेकिन फरवरी 1920 में चोरा चोरी कांड के बाद गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया और इसी घटना से भगत सिंह क्रांतिकारी मन को झनझोर कर रख दिया ।

भगत सिंह का मानना था कि यह गांधीजी की सबसे बड़ी भूल है कि उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया और यहीं से भगत सिंह क्रांतिकारी की राह पर चलने लगे थे । इस कारण से उन्होंने भगवान से भी बैर कर लिया था और कहा था कि मैं एक नास्तिक हूं। भगत सिंह के प्रमुख संगठन में से नौजवान भारत सभा, हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन ऐसोसियेशन प्रमुख थे। दुनिया भर के क्रांतिकारी के बारे में भगत सिंह पढ़ चुके थे । महज 23 साल की उम्र में रूस और यूरोप के क्रांतिकारी लेखकों को अपने अंदर तक उतार चुके थे। साथ में राम प्रसाद बिस्मिल की कविता ने उन्हें ऐसा जोश लाया कि वे किसी भी कीमत पर आजादी के लिए कुर्बान हो सकते थे।

भगत सिंह के विचार

आजादी के दीवाने स्वतंत्रता के लिए भगत सिंह ने लोगों को सिखाया देश के लिए जरूरी हो तो देश के लिए जान दे दो लेकिन बेवजह किसी का खून ना बाहाओ | भारत की क्रांति लिखने वाले भगत सिंह ने कहा कि बम और बंदूक  विचार नहीं लाते हैं,  इंकलाब और इंसाफ लाते विचार लाते है जो देश के लिए जीते हैं वे लोग मर कर भी अमर हो जाते हैं। 1925 में उनकी पार्टी  का नाम भी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन रखा गया  और उसे एक नया नाम 1928 में दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ।

स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह की भूमिका

स्वतंत्रता के लिए सबसे प्रभावशाली क्रांतिकारी भगत सिंह को ही माना जाता हैं। 1925 में काकोरी ट्रेन डकैती हुई थी।  जिसमें बिस्मिल सहित चार क्रांतिकारियों को फांसी की सजा हुई थी। इस कारण भगत सिंह बोखला गए क्योंकि जिस बिस्मिल के शब्दों ने उन्हें जागृत किया था उनकी शहादत का बदला लेने का वक्त ढूंढ रहे थे। 1926 में दशहरा पर एक बम ब्लास्ट होने के कारण उन्हें 1927 में कैद कर लिया गया और उन्हें जेल की सजा हुई । भगत सिंह की सबसे बड़ी ताकत लड़ने और संघर्ष करने की थी। 17 दिसंबर 1928 को पुलिस स्पेक्टर डीएसपी सांडर्स की हत्या कर  कर दी  पर उस वक्त पुलिस को भी भगत सिंह ने चकमा दे दिया और अपना हुलिया बदल लिया था। पूरी दाढ़ी कटवा कर   अंग्रेज साहब जैसे बन गए और लाहौर से निकल भागे और इन को भगाने में एक क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा की पत्नी क्रांतिकारी पत्नी गौरा देवी ने साथ दिया था।

उस समय अंग्रेजों ने मजदूरों के खिलाफ एक कानून बनाया था 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह ने सेंट्रल असेंबली में बम फेंका गया । लेकिन उनका मकसद अंग्रेज़ो के बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचाना था ना कि किसी के ऊपर बम फेंकना । पर भगत सिंह पकड़े जा चुके थे और लाहौर जेल भेजे जा चुके थे धीरे-धीरे उनके क्रांतिकारी साथी भी पकड़े गए या फिर अंग्रेजी पुलिस के हाथों मारे जाने लगे थे।

भगत सिंह जेल की व्यवस्था देख कर जेल में ही एक आंदोलन छेड़ा क्योंकि वहां की जेल की स्थिति अच्छी नहीं थी। जेल में थोड़ी भी मूलभूत सुविधा नहीं थी। आखिरकार अंग्रेजी हुकूमत तो भगत सिंह के आगे झुकना पड़ा क्रांतिकारी कैदियों को सारी मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई गई । भगत सिंह जेल में लिखना और पढ़ना जेल चाहते थे और उन्हें इजाजत भी मिली ।कभी चिट्ठी, कभी डायरी ,दस्तावेज के जरिए अपने विचारों को लोग लोगों तक पहुंचाते रहे।

 भगत सिंह पर पुलिस सांडर्स की हत्या का केस चल रहा था और सभी को पता था कि सजा बहुत ही कड़ी मिलने वाली है । भगत सिंह के पिता ने सरकार से रहम की अपील भी की और 30 सितंबर 1930 को भगत सिंह के पिता ने ट्रिब्यूनल को चिट्ठी भी लिखी थी बचाव के लिए एक मौका देने की मांग की थी पर भगत सिंह इस बात से बेहद दुखी हुए थे।

शहिद भगत सिंह फांसी का दिन

फांसी के ऐलान से लोग काफी खफा थे। हालांकि इसके पीछे गांधी जी का भी विरोध होने लगा था।  फांसी के दिन भगत सिंह ने लेलिन क्रांतिकारी की पुस्तक पढ़ी थी।

फांसी वक्त के पहले दे दी गई थी । 23 मार्च 1931 शाम 7:00 बजे  पाकिस्तान के पंजाब , लाहौर जेल में भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई। और महज 23 साल की उम्र में 23 मार्च 1931 फांसी पर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए भगत सिंह शहीद हो गए।

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