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कृषि सुधार पर निबंध | Essay on Agricultural Reforms in Hindi

हिंदी, हिंदी निबंध

आज हम भारतीय कृषि सुधार पर स्वतंत्रता पश्चात कृषि सुधार कार्य योजनाओं तथा कृषि क्रांति के बारे में किये गए कार्यो को ओर ध्यान देंगे । भारत एक कृषि प्रधान देश है | देश की लगभग 72 प्रतिशत जनसंख्या गाँवों में निवास करती है| जिसका मुख्य व्यवसाय कृषि है। प्रधान व्यवसाय होने के कारण कृषि भारत जैसे विकासशील देश में रोजगार एवं जीवनयापन का प्रमुख साधन औद्योगिक विकास, वाणिज्य एवं विदेशी व्यापार का आधार है| यह भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ तथा विकास की कुंजी है।

भारत में स्वतंत्रता से पूर्व कृषि उत्पादन में गतिहीनता की स्थिति विद्यमान थी तब भारतीय कृषि एक जीविकापार्जन अर्थव्यवस्था जैसी थी | देश के विभाजन के दोरान लगभग एक तिहाई सिंचित भूमि पाकिस्तान में चली गई परिणामस्वरूप स्वतंत्र भारत में सिंचित क्षेत्र का अनुपात कम रह गया स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सरकार का तत्कातिक उद्देश्य खाद्यान का उत्पादन बढ़ाना था जिस हेतु निम्न उपाय किये गये |

व्यापारिक फसलों की जगह खाद्यानों को उगाया जाना, कृषि गहनता को बढ़ाना, कृषि योग्य बंजर भूमि तथा परती भूमि का कृषि जोत में परिवर्तन करना , इसके परिणामस्वरूप स्वतंत्रता के बाद कृषि में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए है कृषि क्षेत्रफल उत्पादकता एवं उत्पादन में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। रासायनिक खादो व उन्नत बीजों का प्रयोग बढा है| सिंचित  क्षेत्रफल में भी वृद्धि हुई है| भूमि सुधारों के माध्यम से मध्यस्थ वर्ग की समाप्ति  होकर किसानो को भूमि पर स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हुए है | सरकार भी कृषि एवं ग्रामीण विकास को उच्च प्राथमिकता देकर कृषि विकास के लिए प्रयत्नशील हैं| कृषि क्षेत्र में नवीन प्रवृत्ति का अध्ययन निम्न प्रकार से किया जा सकता है।

भारत में कृषि सुधार

भारतीय ग्रामीण समाज में कृषि योग्य भूमि ही जीविका का एकमात्र महत्वपूर्ण साधन एवं सम्पति का एक प्रकार है परन्तु स्वतंत्रताके समय तक विभिन्न लोगों के बीच इसका उचित विभाजन नहीं था| कुछ परिवारों के पास अत्यधिक कृषि भूमि थी जो अधिकांशके पास नगण्य थी या बिलकुल नहीं थी |स्वतंत्रता के समय तक अधिकांश ग्रामीण लोग कृषि मजदूरी करके अन्य प्रकार के कार्यों से अपनी आजीविका चलाते थे अधिकांश कृषि मजदूर रोजाना काम करने वाले होते थे जिन्हें वर्ष के बहुत कम दिनों में ही काम मिल पाता था|

 इसी प्रकार पट्टेदारी कास्तकार को भी उपज का अधिकाश  हिस्सा भूस्वामि कृषक को देना पड़ता था अतः उसकी आर्थिक स्थिति भी बदतर ही रहती थी| जमीदारी प्रथा ने अधिकाश  कृषको की माली हालत खस्ता कर दी थी | कृषक भूमि  का मालिक नहीं था साथ ही कृषि उपज का अधिकाश भाग जमीदारों द्वारा ले लिए जाने के कारण वह उसमे अधिक निवेश भी नहीं कर पाता था|

 स्वतंत्रता के पश्चात सरकार का ध्यान कृषि की इस व्यवस्था के सुधार की ओर गया कृषि की उन्नति के लिए कृषक संरचना में महत्वपूर्ण सुधार किये गये, विशेष रूप से भू स्वामित्व एवं भूमि के बटवारे की व्यवस्था में स्वतंत्रता के बाद सरकार ने काश्तकारों उपकाश्तकारों,बटाईदारों एवं भूमिहीन मजदूरों की दशा सुधारने हेतु नई भूमि नीतिलागू की प्रथम पंचवर्षीय योजना में भूमि का मालिक स्वयं किसान को बनाने के उद्देश्य से निम्नकायों को अपनाने हेतु अपेक्षित कानून लागू किये गये |

1.कृषि में मध्यस्थो की समाप्ति ।

2.लगान की दर में कमी काश्तकारों को भूस्वामी के अधिकार देना |

3. कृषि जोतों की अधिकतम सीमा निर्धारित करना एवं अतिरिक्त  कृषि भूमि को भूमिहीन कृषकों एवम कृषि मजदूरों में वितरण करना ।

4. जोतो की चकबन्दी एवं भूमि का अपखंडन रोकना |

5. सहकारी कृषि का विकास करना |

प्रथम योजना अवधि में जमीदारी उन्मूलन कानून एवं अन्य उपायों द्वारा मध्यस्थों का लगभग अंत कर दिया गया. इन सुधारों सेदेश के लगभग दो करोड़ काश्तकार मध्यस्थों के चंगुल से मुक्त हो गये एवं उनका सम्बन्ध सरकार से हो गया| कई भूमि काश्तकारों को भूमि का वितरण किया गया | इससे काश्तकारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ |

द्वितीय पंचवर्षीय योजना में काश्तकारो के भूधारण अधिकारों की रक्षा हेतु उपाय किये गये नए भूमि  कानून बनाये गये और लगभग 1.13 करोड़ कास्तकारो का लगभग 150 करोड एकड़ भूमि के स्वामित्व के अधिकार प्राप्त हुए केरल देश का एकमात्र राज्य है | जहाँ बहु स्वामित्व प्रणाली एवं काश्तकारी व्यवस्था एक ही झटके में समाप्त कर काश्तकारों को कृषि भूमि के स्वामित्व के अधिकार प्रदान किये गये इस हेतु 1969 में कानून बना कर उसे 1980 तक पूर्णरूपेण लागू किया गया| पश्चिम बंगाल में “ओपरेशन बरगा” के तहत यह कार्य किया गया |

भू सीलिंग निर्धारण प्रथम एवं द्वितीय पंचवर्षीय योजनाओ मै कृषि भूमि के स्वामित्व सीमा निर्धारित की गई जिसके अनुसार एक व्यक्ति के स्वामित्व में कितनी अधिकतम कृषि  भूमि हो इसका निर्धारण किया गया इस हेतु “लेण्ड सीलिंग कानून “बनाए गये सीमा निर्धारण के कारण प्राप्त अतिरिक्त भूमि को सरकार द्वारा भूमिहीन कृषकों एवं कृषि मजदूरों में वितरित किया गया।

चकबंदी: कृषि को अधिक फायदेमंद बनाने तथा उसकी उत्पादकता को बढ़ाने हेतु कृषि जोत का आकार अधिक होना चाहिए।इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर सरकार ने एक ही मालिक के अलग अलग स्थान पर स्थित छोटे आकार की कृषि जोतों को एकत्रित कर एक अपेक्षाकृत बड़े आकार की जोत में परिवर्तित करने का कार्य प्रारंभ किया जिसे चकबंदी कहते हैं| इससे कृषि की उत्पादन लागत कम हो पाती है एवं आधुनिक कृषि प्रणाली को प्रोत्साहन मिलता है फलस्वरूप अधिक कृषि पैदावार सम्भव हो पाती हैं।

भूदान आंदोलन: वर्ष 1951 में भूमिहीन मजदूरों को कृषि भूमि पर बसाने हेतु भूदान आंदोलन प्रारम्भ किया गया प्रसिद्ध समाजसेवी एवं सर्वोदयी नेता विनोबा भावे इसके प्रवर्तक थे| इसमें बड़े बड़े कृषिभूमालिकों को अपनी अतिरिक्त स्वेच्छा से दान करने हेतु प्रोत्साहित किया गया, ताकि प्राप्त अतिरिक्त भूमि को भूमिहीन कृषकों एवं मजदूरो में वितरित किया जा सके । इसमें स्वेच्छा से प्रत्येक भूमालिक से अपनी 1/6 कृषि भूमि दान में मांगी गई थी।

बाद में यह आंदोलन ग्रामदान में परिवर्तित हो गया. 1952 में विनोबा भावे न बिहार में पदयात्रा कर 8.4 लाख हैक्टेयर भूमि भूदान में प्राप्त की थी कुल 42 लाख एकड़ भूमि भूदान में प्राप्त हुई थी| संविधान के अनुच्छेद 46 में या निर्देश दिया गया कि राज्य अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के काश्तकारों की भूमि को अन्य जातियों को हस्तांतरण पर रोक लगाए इसी के अनुरूप कानूनन ऐसा प्रावधान कर दिया गया है।

इस प्रकार उपयुक्त प्रयासों द्वारा सरकार ने देश में काश्तकारी एवं कृषि की स्थिति में सुधार का प्रयास किया और इसमें कुछ सीमा तक सफलता भी मिली हैं| कृषकों की माली हालत में कुछ सुधार हुआ है एवं कृषि की उत्पादकता बाढ़ी है| इसी के साथ भूसम्पति में महिलाओं को अधिकार प्रदान करने के उद्देश्य से कई राज्यों में हिन्दू उत्तराधिकार के प्रावधानों में संशोधन के कानून बनाए है| ताकि भू सम्पतियों में स्त्रियों को कानूनी संरक्षण प्राप्त हो सके।

वर्ष 2020 में कृषि सुधारो को आगे बढ़ाते हुए

तीन नए कानून लागू किये गए है ।

1 कृषक को अपनी उपज मंडियों से बाहर किसी को भी बेचने की स्वतंत्रता दी गई है ।

2 न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सरकारी खरीद

यथावत चालू रहेगी ।

3 किसानों को अपनी उपज को एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना किसी रोक टोक के बेचने को बढ़ावा दिया गया है ।

इन कानूनों का जबरदस्त विरोध भी हो रहा है

पिछले 45 दिनों से किसान दिल्ली को घेरे हुए है ,सरकार से बातचीत चल रही है ,सरकार उन कानूनों में कुछ आंशिक सुधारों हेतु सहमत है परंतु किसान बिल वापसी की मांग पर अड़े हुए है और गतिरोध जारी है ।

Disclaimer : This article is accurate and true to the best of the author’s knowledge. Content is for informational or education purposes only and does not substitute for personal counsel or professional advice in business, financial, legal, or technical matters

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