Chandragupta Maurya

चंद्रगुप्त मौर्य

हिंदी, हिंदी निबंध

आज हम आपको एक ऐसे व्यक्तित्व के बारे में अवगत कराने वाले हैं जिसने प्राचीन भारत में छोटे-छोटे खंडों में विभक्त जनपदों को एक सूत्र में पिरोया और समस्त भारत पर अपना शासन किया। चंद्रगुप्त मौर्य- मौर्य वंश के संस्थापक एवं महान क्षत्रिय सम्राट चक्रवर्ती अशोक के पितामह तथा सम्राट बिंदुसार के पिता के बारे में कुछ जानकारियां प्रस्तुत है। राजवंश में जन्मे किंतु लुब्धक के यहां मजदूरी पर पले चंद्रगुप्त मौर्य एक अतुल्य तेजवान और अप्रतिम साहस के साथ-साथ एक बुद्ध पार्क मस्तिष्क के स्वामी थे। चंद्रगुप्त मौर्य वीरता रूपी पुस्तक का पराक्रम रूपी वह पृष्ठ है जिसके बिना वीरता की पराकाष्ठा पूर्णता से वंचित रह जाती है। चंद्रगुप्त मौर्य का चट्टान जैसा साहस और पर्वत शिखर जैसी महत्वाकांक्षाएं हमारे जीवन को अनेक शिक्षाएं देती हैं।    

जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन

चंद्रगुप्त मौर्य के जन्म के विषय में मनीषियों के अलग-अलग अनेक मत प्रचलित हैं, किंतु बौद्ध कालीन लिखे हुए ग्रंथों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ जो वर्तमान पटना के नाम से जाना जाता है। तथा विद्वानों का दूसरा सबसे प्रबल मत यह है कि चंद्रगुप्त मौर्य का जन्म 340 ईसा पूर्व पीपलीवन के राजवंश में क्षत्रिय राजा चंद्रवर्धन तथा रानी मुरा के घर एक शौर्य साली राजकुमार के रूप में हुआ। किंतु जब उनकी आयु महेश डेढ़ वर्ष थी तब मगध के तत्कालीन निरंकुश राजा महापद्मा नंद ने पीपलीवन पर कुटिल योजनाबद्ध तरीके से आक्रमण कर दिया। तथा पीपलीवन के महाराज चंद्रवर्धन को धोखे से मार दिया। जिसके पश्चात चंद्रगुप्त की रानी मां महारानी मुरा ने चंद्रगुप्त मौर्य तथा पीपलीवन के राजकुमार के प्राण बचाने के लिए इन्हें एक लुब्धक को दे दिया। मगध नरेश महापद्मनंद ने रानी मुरा को मगध में एक दासी के तौर पर रखा।

उधर पौरव नरेश पोरस की मृत्यु के बाद भारतवर्ष पर सिकंदर के सेनापति सेलियूकस की बरसी निरंकुशता को मिटाने के लिए महान चाणक्य ने उस समय के सर्व शक्तिशाली साम्राज्य मगध के तत्कालीन नापित सम्राट धनानंद से सेल्यूकस को देश से निकाल फेंकने के लिए गुहार लगाई। किंतु नापित नंद ने कौटिल्य चाणक्य का अपनी सभा में घोर अपमान किया, जिसके कारण चाणक्य ने अपनी शिखा को खोलते हुए यह शपथ ली कि जब तक मैं नंद वंश का समूल नाश नहीं कर दूंगा तब तक मैं अपनी शिखा को नहीं बांधूंगा। समय का पहिया चलता है और एक दिन आचार्य चाणक्य ने वन में एक बालक को अपने मित्रों के साथ सिंहासन सिंहासन खेलते हुए देखा। जिसमें एक 14 वर्षीय अतुल्य तेजवान शौर्य साली और बलिष्ठ शरीर का अपने सर पर काष्ठ का मुकुट रखे हुए राजा के किरदार को बखूबी  निभाते हुए देखा। महान चाणक्य उस बच्चे के भविष्य को चंद क्षणों में समझ गए। और मन ही मन उस बालक को अखंड भारत का सम्राट बनाने का निश्चय किया।       

शिक्षा

आचार्य चाणक्य  ने बालक चंद्रगुप्त मौर्य से मिलने के पश्चात लुब्धक से चंद्रगुप्त की स्वतंत्रता की कीमत देकर स्वतंत्र करा लिया। और चंद्रगुप्त मौर्य को अपना शिष्य बना लिया, आचार्य कौटिल्य के अथक प्रयासों तथा चंद्रगुप्त मौर्य की अटूट लगन ने चंद्रगुप्त मौर्य को एक महान योद्धा एवं कुशल राजनीतिज्ञ तो बना ही दिया, साथ ही साथ कौटिल्य ने चंद्रगुप्त में भविष्य के एक महान शासक को भी जन्म दिया। प्रतिभावान चंद्रगुप्त मौर्य की शिक्षा पूर्ण होते ही आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य को मगध राज धनानंद के विरुद्ध खड़ा कर दिया।

व्यक्तिगत जीवन

प्राप्त अभिलेखो की माने तो आचार्य चाणक्य के शिक्षण काल में चंद्रगुप्त मौर्य को तक्षशिला ले जाया गया जहां पर चंद्रगुप्त का सामना सिकंदर से हुआ, राजनैतिक विषय पर हुई बहस के दौरान अलेक्जेंडर ने चंद्रगुप्त मौर्य की हत्या कर देने का आदेश दे दिया। तब चंद्रगुप्त को बचाने में सेल्यूकस निकेटर की पुत्री शहजादी हेलेना ने चंद्रगुप्त मौर्य को वहां से जीवित निकलने में मदद की। जहां से हेलेना और चंद्रगुप्त मौर्य की प्रेम कहानी का अध्याय प्रारंभ होता है।

चंद्रगुप्त मौर्य और  धनानंद

विष्णु गुप्त चाणक्य के मार्गदर्शन में चंद्रगुप्त मौर्य ने योजनाबद्ध तरीके से मगध पर आक्रमण किया, किंतु चंद्रगुप्त मौर्य की सेना में मगध की सेना की अपेक्षा संख्या बल का काफ़ी सूक्ष्म था। अतः इन ही प्रबल कारणों के परिणाम स्वरूप उस युद्ध में चंद्रगुप्त को पराजय का सामना करना पड़ा तथा धनानंद की विजय हुई। आचार्य चाणक्य की योजना के अनुसार चंद्रगुप्त ने पहले छोटे-छोटे जनपदों को अपने अधीन करने के लिए युद्ध लड़े, जोकि धनानंद के साम्राज्य का अंग थे। कुछ समय पश्चात चंद्रगुप्त और चाणक्य ने सिंध प्रांत और पंजाब को अपने अधीन कर लिया और अन्य छोटे-छोटे राज्यों को भी अपनी सीमा से मिला लिया। *नापित वंश का अंत* चंद्रगुप्त मौर्य पुनः पाटलिपुत्र पर आक्रमण किया और इस बार चाणक्य की सूझबूझ और चंद्रगुप्त मौर्य की बहादुरी ने धनानंद को नेस्तनाबूद कर दिया और मदद से नापित वंश का समूल विनाश कर दिया। और मगध की राजकुमारी अर्थात धनानंद की बहन दुर्धरा से अपना विवाह संपन्न किया, जिनसे मौर्य वंश के द्वितीय सम्राट बिंदुसार का जन्म हुआ।

सेल्युकस पर विजय

आचार्य चाणक्य नीति स्वतंत्र भारत का सपना देखा था, उसे पूर्ण करने के लिए सेल्यूकस का दमन करना आवश्यक था, जोकि शाह सिकंदर का सेनापति और तत्कालीन तक्षशिला का औपचारिक शासक भी था। धनानंद का अंत करने के बाद मगध पति चंद्रगुप्त मौर्य तक्षशिला पर आक्रमण कर सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर दिया, परिणाम स्वरूप सेल्यूकस में अपनी बेटी हेलेना का हाथ चंद्रगुप्त मौर्य को देकर संधि कर ली और संधि स्वरूप हेरात कंधार बलूचिस्तान और काबुल का राज्य भी चंद्रगुप्त को दे दिया। अपनी संधि को दृढ़ करने के लिए चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस निकेटर को 500 हाथी भेंट स्वरूप दिए।

साम्राज्य विस्तार

चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य लगभग संपूर्ण उत्तरी एवं पूर्वी भारत के साथ-साथ बलूचिस्तान मैसूर से लेकर पश्चिम सौराष्ट्र कर्नाटक पंजाब, सिंध प्रदेश अफगान, से लेकर कंधार तक फैला हुआ था।

मृत्यु

जैन साहित्य लेखों के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में मगध पर 12 वर्ष का एक भयानक सूखा पड़ गया, जिससे विक्षिब्ध होकर चंद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य की बागडोर अपने पुत्र बिंदुसार मौर्य को दे दी तथा स्वयं जैन आचार्य भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला चले गए तथा इसी दौरान 298 ईसा पूर्व चंद्र गिरी पहाड़ी पर भारत के इस महान सपूत परमवीर चंद्रगुप्त मौर्य ने अपनी देह त्याग दी तथा पंचतत्व में विलीन हो गए।

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