Kaarak

कारक (परसर्ग-Case)

हिंदी, हिंदी व्याकरण

कारक चिह्नों को ‘परसर्ग’ कहते हैं। ‘कारक’ शब्द संस्कृत की ‘कृ’ धातु में ‘ण्बुल’ प्रत्यय लगाकर बना है। ‘कारक’ शब्द का व्युत्पतिगत अर्थ है- ‘करनेवाला’ या ‘बनानेवाला’। व्याकरण के सन्दर्भ में यह शब्द उद्देश्य और विधेय के मध्य अभीष्ट सम्बन्ध स्थापित करनेवाला प्रमुख तत्त्व माना जाता है। कारक ही एक ऐसा तत्त्व है, जिसके कारण कर्ता, कर्म तथा क्रिया का स्वरूप निर्धारित किया जाता है।

विभिन्न विद्वानों की परिभाषा –

“क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध हो, उसे कारक कहते हैं।” – पण्डित किशोरी दास

“संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप का सम्बन्ध वाक्य के किसी दूसरे शब्द के साथ प्रकाशित होता है, उसे कारक कहते हैं।” – पण्डित कामता प्रसाद गुरु

“वाक्य में नाम-पद का क्रिया के साथ जो सम्बन्ध होता है, उसे ‘कारक’ कहते हैं। कारको द्वारा संज्ञा या सर्वनाम शब्दों का सम्बन्ध, वाक्य के अन्य शब्दों के साथ जाना जाता है। कारकों (परसर्ग) के चिह्नों को विभक्ति कहते हैं।‘ – डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

उपसर्ग किसी भी शब्द के आदि में जुड़ता है जबकि परसर्ग संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण पदों के बाद में। परसर्ग स्वतन्त्र शब्दांश है, जो शब्द से पृथक रहता है जबकि विभक्ति शब्दों में संश्लिष्ट रहती है। विभक्ति के कारण ही शब्दों का मूल रूप विकारयुक्त हो जाता है। ‘परसर्ग’ शब्द, दो शब्दों के मेल से बना है ‘पर’ और ‘सर्ग’। ‘पर’ का अर्थ है बाद और ‘सर्ग’ का अर्थ है चलना; अर्थात् जो तत्त्व शब्द के अन्त में प्रयुक्त हों, उन्हें ‘परसर्ग कहते हैं। हिन्दी में अनेक परसर्ग हैं- ने, को, से, लिए, अरे, वास्ते, में, पर, का, के, की आदि। परसर्ग सदैव शब्दों के बाद लगाये जाते हैं। इनका प्रयोग मात्र संज्ञा या सर्वनाम के साथ ही किया जाता है।

डॉ० वासुदेवनन्दन प्रसाद के अनुसार, “संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से वाक्य के अन्य शब्दों के साथ (संज्ञा या सर्वनाम का) सम्बन्ध सूचित हो, उसे (उस रूप को) कारक कहते हैं।” कारक के भेद-हिन्दी में कारक आठ प्रकार के होते हैं। संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध मूलत: क्रिया से होने के कारण संस्कृत में छ: कारक माने गये हैं। हिन्दी में ‘सम्बन्ध’ और ‘सम्बोधन’ कारकों को जोड़कर इनकी संख्या आठ कर दी गयी है। सम्बन्ध और सम्बोधन में संज्ञा या सर्वनाम का सम्बन्ध क्रिया से न होकर, संज्ञा या संज्ञा को पुकारने के भाव से होता है। इन कारकों और उनकी विभक्तियों को निम्नलिखित सूत्र से याद रखा जा सकता है :-

कर्ता ने, फिर कर्म को, और करण से जान।

सम्प्रदान को, के लिए, अपादान से मान।।

का, के, की सम्बन्ध में, पर अधिकरण समान।

सम्बोधन हे, हो, अरे, कारक की पहचान।।

१- कर्त्ता कारक – जो संज्ञा शब्द अपना कार्य करने के लिए किसी के अधीन नहीं होता, उसे ‘कर्ता कारक’

कहते हैं। इसकी विभक्ति ने है। जैसे-

१. गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा की शिक्षा दी।

२. तुलसी ने ‘रामचरित मानस’ की रचना की।

३. राम ने रावण को मारा।

ध्यान रखने योग्य बातें

(१) अकर्मक क्रिया के साथ ‘ने’ विभक्ति नहीं लगती। जैसे-इन्द्रसेन हँसता है।

(२) कर्म प्रधान क्रिया के कर्ता के आगे कोई चिह नहीं लगता। जैसे- आम खाया गया।

(३) कुछ क्रियाओं के कर्ता के साथ ‘को’ विभक्ति लगती है। जैसे-अन्वित को पढ़ना पड़ेगा।

(४) जब वाक्य में दो क्रियाएँ होती हैं तब प्रथम क्रिया के साथ कर्ता मुख्य रूप में होता है और दूसरी के साथ गौण रूप में जैसे-रक्षिता घर गयी और सो गयी।

(५) क्रिया से पूर्व कौन’ या किसने लगाने पर जो उत्तर मिलता है, वह कर्ता कारक होता है। जैसे-किसने

मारा? उत्तर मिला-‘बदमाशों ने’।

(६) अपूर्ण भूत और भविष्यत् काल में कर्ता के साथ ने विभक्ति नहीं लगती है। जैसे- श्वेता खा रही है, कर्णिका गायन कर रही है।

२- कर्म कारक – जिस वस्तु पर क्रिया के व्यापार का फल पड़ता है, उसे सूचित करनेवाले संज्ञा के रूप की ‘कर्म कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति को है। जैसे—

१. शिकारी शेर को देखता है।

२. शिक्षक ने छात्रों को पढ़ाया।

३. राम ने रावण को मारा।

ध्यान रखने योग्य बातें

(१) सकर्मक क्रिया का पूरक भी कर्म कारक में होता है, जैसे- अनुपमा को नर्तकी बना दें। इस वाक्य में ‘नर्तकी’ कर्म कारक है।

(२) क्रिया के आगे ‘किसको’ या ‘क्या’ लगाने से जो उत्तर मिलता है, वही कर्म होता है। जैसे- अध्यक्ष

को चुन लें।

(३) कहीं-कहीं कर्म कारक की विभक्ति ‘को’ का प्रयोग नहीं किया जाता। जैसे- मैं रोटी खाता हूँ।

३- करण कारक – कर्ता जिसकी सहायता से कुछ कार्य करता है, उसे ‘करण कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति से है। ‘करण’ का शाब्दिक अर्थ है-‘सहायक’ या ‘साधन’। जैसे—

१. तपेश गिलास से पानी पीता है।

२. वह लेखनी से पत्र लिखता है।

३. कंजिका ने तूलिका से चित्र बनाया।

ध्यान रखने योग्य बातें

(१) कर्मवाच्य में कर्ता करण कारण में रहता है। जैसे- हाथ से फल तोड़ा गया।

(२) कार्यकारण सम्बन्ध में भी करण कारक होता है। जैसे- सूत से कपड़ा बना।

४- सम्प्रदान कारक – जिसके लिए काम किया जाता है, उसे ‘सम्प्रदान कारक’ कहते हैं। सम्प्रदान कारक की विभक्ति को, के लिए है। ‘सम्प्रदान’ का शाब्दिक अर्थ है-‘देना।

जैसे- १. विराम नहाने को गया। २. अभिराम श्याम के लिए आम लाया।

५- अपादान कारक – संज्ञा या सर्वनाम का वह रूप, जिसमें किसी वस्तु का अलग होना पाया जाए, उसे ‘अपादान कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति से है। ‘अपादान’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘अलगाव की प्राप्ति’।

जैसे- १. वृक्ष से फल गिरा। २. पेड़ से पत्ता पृथ्वी पर गिरा। ३. वह छत से गिर पड़ेगी।

६- सम्बन्ध कारक – संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी एक वस्तु का सम्बन्ध किसी दूसरी वस्तु के साथ ज्ञात हो, उसे ‘सम्बन्ध कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति का, की, के, रा, री, रे है।

जैसे- १. अमर का घर अच्छा है। २. भारतेन्दु के नाटक श्रेष्ठ हैं। ३. यान की गति तीव्र है।

७- अधिकरण कारक – क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को ‘अधिकरण कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति में, पै, पर है। ‘अधिकरण’ का शाब्दिक अर्थ है-‘आधार’।

जैसे- १- सिंह वन में रहता है। २- सौम्य घर में है। ३- पुस्तक मेज पर है।

ध्यान रखने-योग्य बातें

(१) ‘अधिकरण’ का अर्थ होता है, ‘आधार’ और आधार दो प्रकार के होते हैं-

(क) भीतरी आधार,

(ख) बाहरी आधार।

भीतरी आधार की विभक्ति में’ है और बाहरी आधार की विभक्ति ‘पर’।

(२) कहीं-कहीं में विभक्ति लुप्त रहती है। जैसे-उस समय (में) में उपस्थित नहीं था।

८- सम्बोधन कारक – संज्ञा के जिस रूप से किसी के बुलाने या पुकारने का या संकेत करने का भाव प्रकट हो, उसे ‘सम्बोधन कारक’ कहते हैं। इसकी विभक्ति हे, हो, अरे, अजी, अहो है।

जैसे- (१) हे भगवान्! अब क्या होगा? (२) अरे! तुम अभी घर नहीं गये। (३) अजी! रूठकर अब कहाँ जाइएगा? अहो! आपके दर्शन तो हुए।

Leave a Reply

*

code