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अलेक्जेंडर( सिकंदर)

हिंदी, हिंदी निबंध

प्राचीन इतिहास का वह समय जब भारतवर्ष दुनिया के नक्शे में सोने की चिड़िया के रूप में देखा जाता था, तब यूनान के एक छोटे से राज्य मेसेडोनिया की कोख से जन्मा एक बालक विश्व पटल के नक्शे पर रक्त का तांडव कर रहा था। विश्व विजेता कहा जाने वाला सिकंदर एक ऐसा निर्दयी शासक था, जिसने शाही तख्त को हथियाने के लिए कई अपनों का रक्त बहाया। जिसमें से उसका अपना वालिद और कई सौतेले भाई भी थे। सिकंदर उस चक्रवात का नाम है जो जिस रास्ते से होकर गुजरता, उधर की सारी जमी को नेस्तनाबूद कर देता था और यूनानी परचम लहरा देता था। रक्त की प्यासी चमचमाती हुई दो धारी तलवार जिस तरफ घूम जाती थी वहां शहर के शहर वीरान हो जाते थे बच्चे, युवा, महिलाएं कोई भी बख्शा नहीं जाता था सारे के सारे मौत का निवाला बना दिए जाते थे। स्वयं को यूनानी देवता जीयूस की औलाद कहने वाला सिकंदर, अपने समय में दुनिया का सबसे शक्तिशाली राजा था।         

जन्म एवं प्रारंभिक जीवन

सिकंदर महान का जन्म 356 ईसा पूर्व यूनान के एक छोटे से राज्य मेसेडोनिया में पेला नामक स्थान पर हुआ था।  सिकंदर प्रायः अलेक्जेंडर तृतीय के नाम से भी जाना जाता है। अलेक्जेंडर के वालिद फिलिप मेसेडोनिया का शाह था,शाह फिलिप ने मेसेडोनिया की सीमा से सटे अन्य राज्य को युद्ध में जीत लिया,और वहां की शहजादी ओलंपिया से जबरन शादी कर ली।विवाह के कुछ समय पश्चात,ओलंपिया की कोख से शाह फिलिप की औलाद अलेक्जेंडर ने जन्म लिया।अलेक्जेंडर की एक छोटी बहन भी थी,  सिकंदर को उसकी मां ओलंपिया ने प्रारंभ से ही उसके पिता फिलिप के विरुद्ध उकसाना शुरू कर दिया था।और दोनो कांपलन पोषण भी सही ढंग से मेसेडोनिया में ही किया गया।सिकंदर को उसकी मां ने सारी कायनात पर मेसेडोनियन परचम लहराने का सपना दिखाया।                            

शिक्षा 

सिकंदर की शिक्षा की शुरुआत उसके अपने रिश्तेदार दी स्टेन लियोनिदास ऑफ एपिरूस के संरक्षण में हुई।हालांकि अलेक्जेंडर सियासत और जंगी तजुर्बों में काफी माहिर था। इसके साथ-साथ अलेक्जेंडर काफी उग्र स्वभाव का विद्यार्थी था, छोटी से छोटी बात पर वह अपने साथ के विद्यार्थियों के ऊपर तलवार उठा देता था। यही कारण था कि उसके सहपाठियों के साथ-साथ अध्यापकों में भी अलेक्जेंडर का खौफ बना हुआ था। विलक्षण प्रतिभाओं का धनी अलेक्जेंडर घुड़सवारी में भी काफी माहिर था, वह अपनी प्रत्येक चुनौती को जंग के रूप में देखता था, और अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए वह किसी भी हद को पार कर सकता था।यही कारण था सिकंदर का कोई भी सहपाठी उसके साथ स्पर्धा करने के लिए तैयार नहीं होता था। सिकंदर की इन्हीं योग्यताओं के कारण वश उसके गुरु स्तन लियोनिडास उसे संभाल न सके,और शाह फिलिप से दूसरा अध्यापक ढूंढ लेने को कहा।                               

अलेक्जेंडर को अरस्तू का मार्गदर्शन

महान दार्शनिक अरस्तू (एरिस्टोटस) से सिकंदर की भेंट तब हुई, जब सिकंदर की उम्र महज़ 13 वर्ष थी। सिकंदर ने अरस्तु से गणित मनोविज्ञान दर्शन शास्त्र राजनीति वाकपटुता घुड़सवारी युद्ध कौशल आदि विषयों की शिक्षा प्राप्त की। हर विषय में अलेक्जेंडर की प्रवीणता को देखकर अरस्तु मन ही मन एलेग्जेंडर को विश्व विजेता के रूप में देखने का सपना संजो रहे थे। गुरु अरस्तु की मेहनत और अपनी लगन के साथ सिकंदर ने हर मुश्किल चुनौती का सामना करते हुए उनके दिखाए हुए रास्ते पर चलकर अपने लक्ष्य की सीढ़ियों पर लगातार आगे बढ़ता जा रहा था।                                 

एक अद्वितीय योद्धा

विलक्षण प्रतिभाओं का धनी एलेग्जेंडर प्रारंभ से ही एक अद्वितीय योद्धा भी था। इस बात का अंदाजा इसी वाक्ये से लगाया जा सकता है, की घोड़ों की दलान में एक ब्यूटी फेस नाम का ऐसा घोड़ा था जो किसी भी  सवार के काबू में नहीं आ सकता था, किंतु 13 वर्षीय बालक सिकंदर ने अपनी बुद्धिमत्ता और कुशलता से उस घोड़े को ना कि अपने नियंत्रण में किया, बल्कि ताउम्र उसे अपनी बरखुरदारी  में लगा लिया।

तख्त -ओ -ताज की महत्वाकांक्षा

मेसिडोनिया का सरताज बनने की उसकी महत्वाकांक्षा ने, उसे अपने वालिद के साथ-साथ कई अन्य सौतेले भाइयों सहित सौतेली मां का कातिल बना दिया। इस घटनाक्रम में उसकी मां ओलंपिया का उसके कंधे पर मजबूत हाथ रहा। पिता साहब फिलिप की हत्या के बाद महज 19 वर्ष में वह मेसेडोनिया का शासक बन गया।                         

सल्तनत विस्तार

मेसिडोनिया के तख्त पर बैठते ही सिकंदर ने समूचे यूनान पर अपना शासन फैला दिया। यूनान के एक छोटे से राज्य पैट्रिया के शाह ने एलेग्जेंडर के सामने सर उठाने की जुर्रत की, परिणाम स्वरूप अलेक्जेंडर ने उसके सर को बलपूर्वक कुचल दिया। और बैटरी की राजकुमारी रुखसाना से अपना विवाह कर लिया। रुखसाना को वह प्यार से रुकसेन कहता था। प्रक्रिया के बाद अब सिकंदर का सीधा निशाना पारस (परसिया) पर था। फारस के तत्कालीन शाह डेरियस की सेना जो अलेक्जेंडर की सेना के लगभग 8 गुनी थी उसको अपनी कूटनीतिज्ञ तथा राजनीतिक चालों से मात दे दी, तथा उस समय के सबसे ज्यादा वर्चस्व वाले राज्य पारस मेसिडोनियन परचम लहरा दिया। सिकंदर इस बड़ी जीत के भी बात ना रुका और अपना विजय रथ ईरान इराक लेवान ब्राजील ताइवान के साथ-साथ विश्व की लगभग बहुत बड़े भूभाग पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया।                                       

सिकन्दर का भारत पर आक्रमण

विश्व की अत्यधिक भूमि जीतने के बाद सिकंदर ने भारत को अपना निवाला बनाना चाहा और भारत पर आक्रमण कर दिया। उस समय हिंदुकुश की घाटी से होकर भारत की ओर आया जा सकता था जहां तक्षशिला में विदेशियों का सर्वप्रथम प्रवेश होता था, तक्षशिला के तत्कालीन राजा ने सिकंदर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और तक्षशिला को हानि ना पहुंचाने के संधि के साथ एलेग्जेंडर का साथ भी दिया।                                            

अलेक्जेंडर और पोरस

भारत वर्ष के लगभग सभी राजाओं ने तक्षशिला की तर्ज पर सिकंदर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।  किंतु झेलम एवं चिनाब नदियों के बीच में स्थित पौरव राष्ट्र के महाराज पोरस ने सिकंदर रूपी आंधी से डटकर सामना करने का निर्णय लिया। और अपने हाथों में मृत्यु तथा उस समय के आधुनिक हथियारों द्वारा सिकंदर को रोकने की पूर्णतया कोशिश की, किंतु बरसात हो जाने के कारण महाराज पोरस के हाथी एवं रथ जमीन में धंसने लगे जिस का सिकंदर को पूरा फायदा मिला। तथाकथित इतिहासकारों की मानें तो उस युद्ध का विजेता सिकंदर बताया जाता है, किंतु कुछ साक्ष्य के आधार पर कल्पना की जाती है कि झेलम के उस क्षेत्र में सिकंदर की सेना को पोरस में बहा दिया और उस भयानक युद्ध का विजेता भारतवर्ष का लाल पोरस बना। और भारतवर्ष के इस अवैध चट्टान को तोड़ने में नाकामयाब होकर सिकंदर ने मेसेडोनिया लौट जाने का निर्णय लिया। सिकंदर ने पोरस की बुद्धिमत्ता और युद्ध कौशल से प्रभावित होकर पोरस को भारतवर्ष रूपी जंगल का शेर कहकर नवाजा।      

मृत्यु

भारतवर्ष से मेसिडोनिया की ओर लौटते हुए सिकंदर जब बेबीलोन पहुंचा, तब उससे मलेरिया ने गंभीरता  से जकड़  लिया, 323 ईसा पूर्व सिकंदर महान की मृत्यु हो गई।

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