संस्कृत श्लोक अर्थ सहित | Sanskrit Slokas with meaning

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संस्कृत भाषा कभी हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की मूल और वाहक भाषा रही है. जिसमें हमारे ऋषि-मुनियों ने तथा तत्कालीन समाज के प्रबुद्ध व्यक्तियों ने ज्ञान के सूत्रों को श्लोक सुभाषित और अन्य रूपों में संग्रहित किया है। इसी अनमोल खजाने से हमने आपके लिए कुछ बेहद अनमोल मोतियों को प्रस्तुत करने की कोशिश की है। आशा करते हैं आपको ये अच्छे लगेंगे –



वह व्यक्ति जो अलग अलग जगहों या देशो में घूमकर विद्वानों की सेवा करता है, उसकी बुद्धि का विस्तार/विकास उसी प्रकार होता है, जैसे तेल की बूंद पानी में गिरने के बाद फ़ैल जाती है|

दो प्रकार के लोग हैं जिनको एक भारी पत्थर के साथ गहरे समुद्र में धकेलना उचित होगा – वे धनी जो दान नहीं करते हैं, और गरीब जो मेहनत नहीं करते हैं।

संसार में उन्नति के अभिलाषी व्यक्तियों को इन ६ दोषों – नींद, तंद्रा(ऊँघ), भय, क्रोध, आलस्य तथा देर से काम करने की आदत- को सदा के लिए त्याग देना चाहिए ।

किसी जगह पर बिना बुलाये चले जाना, बिना पूछे बहुत अधिक बोलते रहना और जो चीज या व्यक्ति विश्वास करें योग्य नहीं है उस पर विश्वास करना, मूर्ख लोगो के लक्षण होते हैं।

जैसा मन होता है वैसी ही वाणी होती है, जैसी वाणी होती है वैसे ही कार्य होता है ।
सज्जनों के मन​, वाणी और कार्य में समानता होती है ।

किसी व्यक्ति को आप चाहे कितनी ही सलाह दे दो किन्तु वह अपना मूल स्वभाव नहीं बदलता ठीक उसी तरह जैसे ठन्डे पानी को उबालने पर तो वह गर्म हो जाता है लेकिन बाद में वह पुनः ठंडा हो जाता है।

यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आपकी सहायता करे तो उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह ही महत्व दे, यदि आपके परिवार का व्यक्ति आपको नुकसान पहुंचाए तो उसे महत्व देना बंद कर दे. ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुँचाने लगती है. जबकि जंगल में उगी हुई औषधी हमारे लिए लाभकारी होती है।

जिसके पास विद्या, तप, ज्ञान, शील, गुण और धर्म में से कुछ नहीं, ऐसे लोग इस धरती के लिए भार है और मनुष्य के रूप में जानवर बनकर घूमते है।

निम्न कोटि के लोगो को सिर्फ धन की इच्छा रहती है, मध्यम कोटि का व्यक्ति धन और मान चाहता हैं, किन्तु उत्तम कोटि का व्यक्ति केवल मान चाहते हैं, सम्मान धन से अधिक मूल्यवान है।

जिस तरह लोग नदी पार करने के बाद नाव को भूल जाते है, ठीक प्रकार से लोग अपने काम पूरा होने तक दूसरो की प्रसंशा करते है और काम पूरा हो जाने के बाद व्यक्ति को भूल जाते है।

कोई चोर न तो इसे चुरा सकता है, न ही कोई राजा इसे छीन सकता है, इसको संभालना मुश्किल भी नहीं है और न ही इसका भाइयो में बंटवारा होता है, खर्च करने से बढ़ने वाला यह धन है विद्या जो सभी धनो से श्रेष्ठ है।

जैसे सौ लोगो में एक शूरवीर होता है, हजार लोगो में एक विद्वान होता है, दस हजार लोगो में एक अच्छा वक्ता होता है वही लाखो में बस एक ही दानी होता है।

एक राजा और विद्वान में कभी कोई तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि एक राजा को केवल अपने राज्य में सम्मान मिलता है वही एक विद्वान हर जगह सम्मान पाता है।

आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है, मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र परिश्रम होता है क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं रहता।

जैसे एक पहिये के साथ रथ नहीं चल सकता ठीक उसी तरह से पुरुषार्थ किये बिना किसी का भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता।

जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से विमुख हो जाता है वह व्यक्ति बलवान होने पर भी असमर्थ, धनवान होने पर भी निर्धन व ज्ञानी होने पर भी मुर्ख होता है।

अच्छे मित्रों की संगत बुद्धि की जटिलता को हर लेता है, हमारी बोली सच बोलने लगती है, इससे मान और उन्नति बढती है और पाप मिट जाते है

इस संसार में चन्दन सबसे अधिक शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा, चन्दन से भी शीतल होता है ऐसे ही एक अच्छे मित्र चन्द्रमा और चन्दन से अधिक शीतल होते हैं।

यह मेरा है और यह तेरा है, ऐसी सोच छोटे विचारो वाले लोगो की होती है. इसके विपरीत उदार रहने वाले व्यक्ति के लिए यह संसार ही एक परिवार की तरह होता है।

विद्या यात्रा में ,पत्नी घर में ,औषध रोगी का तथा धर्म ही मृतक का सबसे बड़ा मित्र होता है |

अचानक जोश में आ कर बिना सोचे समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि विवेक हीनता ही सबसे बड़ी विपत्तियों का कारण होती है | इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है, माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है |

जीवन में कोई भी काम केवल सोचने से पूरा नहीं होता बल्कि उसके लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है जैसे कभी सोते हुए शेर के मुँह में हिरण स्वयं प्रविष्ट नहीं होते ।

विद्या हमें विनम्रता प्रदान करती है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है और इस धन से हम धर्म के कार्य करते है और सुखी रहते है।

जो माता- पिता अपने बच्चो को शिक्षा नहीं है ऐसे माँ-बाप बच्चो के शत्रु के समान है, विद्वानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पा सकता वह वहां हंसो के बीच एक बगुले की तरह होता है।

सुख चाहने वाले को विद्या नहीं मिल सकती है वही विद्यार्थी को सुख नहीं मिल सकता. इसलिए सुख चाहने वालो को विद्या का और विद्या चाहने वालो को सुख का त्याग कर देना चाहिए।

जो व्यक्ति अभिवादन शील एवं विनम्र है तथा अपने से बड़ों का सम्मान करता है . नित्य प्रतिदिन वृद्धजनों की सेवा करता है.उसे इस सेवा के फलस्वरूप जो आशीर्वाद प्राप्त होता है, उससे उसके आयु विद्या कीर्ति और बल में वृद्धि होती है।

एक एक क्षण का सदुपयोग कर विद्या प्राप्त करनी चाहिए तथा एक एक कण को महत्वपूर्ण समझ कर के धन संचय करना चाहिए. क्षण के महत्व को बिना समझे उसे गंवाने वाले को विद्या कहां प्राप्त होगी ? ठीक उसी प्रकार जो कण(धन का अत्यंत छोटा सा हिस्सा) के महत्व को नहीं समझेगा उसे धनवान बनने का सुयोग नहीं प्राप्त हो सकता |

आलस्य ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है तथा परिश्रम जैसा कोई दूसरा मनुष्य का अनन्य मित्र नहीं है. परिश्रम करने वाला मनुष्य कभी भी दुःख नहीं भोगता।

जिस प्रकार एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है, उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है . अतः भाग्य के भरोसे सब कुछ छोड़कर मत बैठिये लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करते रहिये।

पुस्तक में रखी विद्या ज्ञान की बातें तथा दूसरे के हाथ में गया धन, ये दोनों जब बहुत आवश्यकता हो जरूरत हो, उस वक्त काम नहीं आता. अतः व्यक्ति को इस बात को हमेशा ध्यान में रख कर ही आचरण करना चाहिए।

मधुर वचन से सभी जीवों को प्रसन्नता होती है,फिर मधुर वचन बोलने में कमी कैसे ? अतएव हमें सदा सर्वदा मधुर वचन ही बोलना चाहिए।

बिना बुलाए कहीं जाना, बिना किसी के पूछे बहुत बोलना, विश्वास नहीं करने योग्य व्यक्तियों पर विश्वास करना, ये सभी मूर्ख लोगों के लक्षण हैं.अतः अपने जीवन में हमें इनका ध्यान रखना चाहिए

रूप और यौवन से सम्पन्न तथा उच्च कुलीन परिवार में उत्पन्न व्यक्ति भी विद्याहीन होने पर सुगंध रहित पलाश के फूल की भाँति ही शोभा नहीं देते.विद्या अध्ययन करने में ही मनुष्य जीवन की सफलता है

विद्या के सामान कोई बंधु नहीं , विद्या जैसा कोई मित्र नहीं, विद्या धन के जैसा अन्य कोई धन या सुख नहीं. अतः विद्यार्जन जरूर करनी चाहिए

इस संसार में सम्पन्न होने अथवा उन्नति करने की प्रबल इच्छा रखने वाले मनुष्यों को इन छह आदतों का परित्याग कर देना चाहिए – (अधिक) नींद लेना अथवा अधिक सोना, जड़ता, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता अर्थात कार्यों को टालने की प्रवृत्ति. अन्यथा ये आदतें व्यक्ति के उन्नति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बन सकती हैं।

Disclaimer : This article is accurate and true to the best of the author’s knowledge. Content is for informational or education purposes only and does not substitute for personal counsel or professional advice in business, financial, legal, or technical matters

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